शर्मसार करती भुखमरी ……….

12 अक्टूबर को जारी हुई वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआई) की रिपोर्ट सोशल मीडिया पर सबसे ज्यावदा चर्चा की विषय बन गई. रिपोर्ट में बताया गया कि भारत, भुखमरी सूचकांक में और नीचे आ गया है अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) के बयान में कहा गया-भारत का स्थान 119 देशों में 100वें नंबर पर है, और उसे पूरे एशिया में तीसरा सबसे ज्यादा स्कोर मिला है.  केवल अफगानिस्तारन और पाकिस्ता न की रैंकिंग ही सबसे खराब हैरिपोर्ट में आगे कहा गया है, ”31.4 के साथ, भारत का 2017 जीएचआई (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) स्कोगर गंभीरश्रेणी के उच्चर सिरे पर है और यह इस वर्ष जीएचआई में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले क्षेत्र की श्रेणी में दक्षिण एशिया के पिछड़ने का एक मुख्य कारण है, इस श्रेणी में दक्षिण एशिया, सहारा के दक्षिण अफ्रीका से कुछ ही पीछे है.  इस समाचार की रिपोर्टिंग सभी मुख्य  मीडिया हाउस द्वारा की गई, ये खबर निश्चित ही चिंता बढ़ाने वाली है. कि पिछले साल की तुलना में वैश्विक भुखमरी सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स- जीएचआई) में भारत तीन पायदान नीचे उतर गया है वर्ष 2016 में इस सूचकांक में भारत 119 देशों में 97वें स्थान पर था. अब 100वें नंबर पर है , क्या यह तथ्य हमारे लिए गहरी चिंता का कारण नहीं होना चाहिए कि इस सूचकांक में उत्तर कोरिया, बांग्लादेश और इराक जैसे देश भी भारत से ऊपर रहे हैं  जीएचआई चार संकेतकों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाता है.
 


ये हैं- आबादी में कुपोषणग्रस्त लोगों की संख्या, बाल मृत्युदर, अविकसित बच्चों की संख्या और अपनी उम्र की तुलना में छोटे कद और कम वजन वाले बच्चों की तादाद वॉशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) द्वारा तैयार भुखमरी सूचकांक में भारत पहले से काफी नीचे आता रहा है. न्‍यूज़ रिपोर्ट के अनुसार जिनमें यह भी बताया गया कि भारत की जीएचआई रैंक 45 स्थान नीचे आ गई हैं, मैंने प्रधानमंत्री मोदी जी की आर्थिक सलाहकार परिषद के वर्तमान अध्‍यक्ष श्री बिबेक देवरॉय को टैग करते हुए एक ट्वीट किया. इसकी प्रमुख वजह यहां कुपोषणग्रस्त बच्चों की बड़ी संख्या है. भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती दो अर्थव्यवस्थाओं में एक है. दुनिया की एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में आज इसकी प्रतिष्ठा है. इसके बावजूद भुखमरी सूचकांक में इतना पीछे होना हम सबके लिए गहरे आत्म-मंथन का विषय होना चाहिए. अधिक फिक्र की बात इस मोर्चे पर अपने देश का इस वर्ष और पिछड़ जाना है. नरेंद्र मोदी सरकार ने जन-कल्याण के कार्यक्रमों को प्रभावी और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने पर खास ध्यान दिया है. उसने सत्ता में आने के बाद विकास नीति पर नया नजरिया अपनाया. उसका जोर राज्यों को सशक्त करने पर रहा है. सोच यह है कि राज्य सरकारें अपनी खास जरूरतों के मुताबिक कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर स्वरूप देंगी और उन्हें अधिक उत्तरदायित्व के साथ लागू करेंगी. लेकिन इस बीच आखिर कहां चूक हो रही है. समस्या नीतिगत है या खामी अमल में है, इसका अविलंब ठोस आकलन किया जाना चाहिए.आईएफपीआरआई ने एक खास मसले की तरफ ध्यान खींचा है. उसने जिक्र किया है कि भारत की एक फीसदी आबादी के पास देश के कुल धन का आधे से ज्यादा हिस्सा है. इस विषमता का अर्थ यह है कि देश में जो धन पैदा होता है, उसका ज्यादा हिस्सा कुछ हाथों में सिमट जाता है.


यानी देश भले लगातार धनी हो रहा हो, लेकिन उसका लाभ सभी तबकों को नहीं मिल रहा है. इस कारण भारतीय जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा बुनियादी सुविधाओं और अवसरों से वंचित बना हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि सरकार ने सबको पोषण उपलब्ध कराने के कार्यक्रम बड़े पैमाने पर चलाए हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं तथा कई तरह की व्यवस्थागत समस्याओं के कारण इनके लाभ देश के सभी हिस्सों और तबकों तक नहीं पहुंच पाते. ये ऐसे अप्रिय तथ्य हैं, जिन पर सरकारों को तुरंत ध्यान देना होगा. उन्हें समझना होगा कि जीएचआई जैसे पैमानों पर देश की खराब छवि उभरती रही, तो दूसरे क्षेत्रों की तमाम उपलब्धियों पर ग्रहण लगा रहेगा. देश की समूची आबादी को सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को पूरा करने हेतु अनिवार्य है.

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