हमें स्वच्छ भारत बनाना है पर हम सिर्फ
झाड़ू लगाकर भारत को स्वच्छ नहीं बना सकेंगे. हमें अपनी सोच बदलनी होगी, हमें ऐसा माहौल बनाना
होगा कि सड़क पर कचरा ही न फैले हमें झाड़ू लगाने की नौबत ही न पड़े इसके लिए हमें
नैतिक बल तो दिखाना होगा साथ ही हमें इसके लिए दण्डात्मक व्यवस्था भी लगानी होगी
क्योंकि जब हम भारत में मेट्रो स्टेशन पर थूकने पर 200 रुपए के जुर्माने का बोर्ड
पढ़ते है तो हम थूक आने पर भी अपनी थूक गटक जाते हैं. हम सिंगापुर एवं अन्य
देशों का उदाहरण देखते हैं कि वहां पर गंदगी फैलाने पर कितना जुर्माना लगता है. यानी कुल मिलाकर हमें भारत को
स्वच्छ बनाना है पर यह गंदगी व प्रदूषण झाडू़ से नहीं, स्वयं की सोच सफाई के लिए बना कर प्रयास करना होगा. आइए हम देखे कि कैसे होगा हमारा
भारत स्वच्छ हमें सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जल और वायु को सबसे पहले स्वच्छ
बनाना होगा. हम जैसे एक्वागार्ड
लगाकर घर में पानी साफ कर लेते हैं वैसा ही प्रयास हमें सार्वजनिक पानी के स्रोतों
की स्वच्छता पर देना होगा - हमें नदियो- गंगा, यमुना एवं अन्य जल को प्रदूषण
मुक्त बनाना होगा इसके लिए पहला सार्थक प्रयास यह होगा कि हम स्वयं कचरा न डालें
पूजन सामग्री, घर की मूर्तियां या प्लास्टर ऑफ पेरिस व केमिकल युक्त दुर्गा, गणेश प्रतिमा नदियों में विसर्जित न करें वहीं बड़े स्तर पर उद्योगों का
अपशिष्ट, सीवर का गंदा पानी, नदियों में जाने से रोकें एसटीपी व ईटीपी व्यवस्था को बेहतर कर पानी को शोधित
कर उसे सिंचाई में प्रयुक्त करें . स्वच्छ भारत अभियान के
लिए जो एक और अनिवार्य व बड़ा कदम है वह है, ठोस अपशिष्ट का निपटान करना जिसमें
हम सबसे बड़े रूप में प्लास्टिक व पॉलिथीन को ले सकते है. आज पॉलिथीन संस्कृति की सस्ती
सुविधा ने मनुष्य को सिर से पांव तक पॉलिथीन में कैद कर लिया है खाने-पीने का समान
हो- दूध, दही, चाय, घी, सब्जी, आटा, चावल, दाल सब इसमें ही पैक है इसने झोला संस्कृति को नष्ट कर दिया है लोग पॉलिथीन का
प्रयोग कर इसे नालियों में फेंक देते हैं जो नालियों को जाम कर देता है जिससे
बारिश में मुहल्लों में पानी भर जाता हैं वही ये बहकर गंगा यमुना एवं अन्य नदियों
को प्रदूषित कर इनके तटों को गंदा करते हैं और नदियों के प्रवाह को भी प्रभावित
करते हैं. पॉलिथीन भूमिगत जल
स्रोत को भी प्रभावित करता है. और जिस सफाई की बात आज हो रही है उस गंदगी का 80 प्रतिशत पॉलिथीन की
वजह से ही है क्योंकि बाकी गंदगी तो बायोडिग्रेडेबल है एंव नष्ट भी हो जाती है पर
पॉलिथीन कचरा नॉन-बायोडिग्रेडेबल है जिसके कारण वह 100 साल में भी नष्ट नहीं
होता और चारों तरफ फैला रहता है. नगर निगम जैसी सरकारी संस्था उसका सही से निपटान भी नहीं कर पाता है. स्वच्छ भरत के मार्ग का पॉलिथीन
कचरा सबसे बड़ा रोड़ा है. भारत विकासशील देश से विकसित देश की ओर तेजी से बढ़ रहा है. भारत गांवों का देश रहा है पर आज
के संचार युग में भारत का पिछड़ा गांव भी ग्लोबल विलेज में बदल गया है. एक क्लिक पर भारत विश्व के किसी
भी कोने से जुड़ जाता है. भारत हर तरफ आगे बढ़ रहा है. बाजारवाद में भारत ने खुद को
स्थापित कर लिया है पर भारत आज भी एक बड़ी चीज से निजात नहीं पा सका है जिसे गंदगी
कहें, कचरा या प्रदूषण भारत के जिस भी हिस्से में हम देखें हमें गंदगी का अम्बार
दिखाई देता है भारत में हर चीज के लिए बड़े-बड़े आंदोलन व धरने देखने को मिलते रहे
हैं पर गंदगी को हमने छोटा समझा इसके लिए छोटे-छोटे स्तर पर प्रदूषण के खिलाफ तो
आवाज उठी पर समग्र रूप में गंदगी को दूर करने का प्रयास नहीं हुआ था महात्मा गांधी जिन्हें आदर्श माना जाता है वो
गंदगी के खिलाफ थे वो स्वयं सफाई अभियान करते थे पर उनकी सोच भी सम्पूर्णता नहीं
पा सकी क्योंकि वो अपने आश्रम व घर को तो साफ करते थे उन्होंने भारत को अंग्रेजों
से तो मुक्त करा दिया पर गंदगी से वो भी भारत को मुक्त नहीं करा पाए न ही गंदगी को
राष्ट्रव्यापी आंदोलन बना सकें 2014 में भारत में
एक युग का परिवर्तन होता है और राजनीतिक शिखर पर एक बड़ा नाम नरेन्द्र मोदी के रूप
उभरा और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर भाजपा के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनाई
और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने सरदार पटेल, महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय जैसे आदर्शों को सामने रख कर कार्य करने का निर्णय लिया और 15 अगस्त को लाल किले से उन्होंने सबसे बड़ा संदेश जो दिया उससे पूरे देश में
शौचालय बनाने पर बल दिया और महिलाओं व बच्चियों के लिए अलग से शौचालय निर्माण की
बात की साथ ही उन्होंने महात्मा गांधी के आदर्श को सामने रख कर भारत को गंदगी
मुक्त करने का अभियान शुरू करने की बात की और 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान का शुभारम्भ कर दिया जिसमें उन्होंने 2019 तक कचरा मुक्त भारत बनाने का संदेश दिया इस कार्य को बड़ा रूप देने के लिए
उन्होंने सचिन तेन्दुलकर,
अनिल अम्बानी, सलमान खान, शशि थरूर सरीखे 9 लोगों को चयनित कर ऐसे ही 9 का दल बनाने की बात की और उन्होंने
स्वयं वाल्मिकी आश्रम में झाडू़ लगाकर अभियान शुरू किया और देखते-देखते उनके सभी
मंत्री, केन्द्रीय कर्मचारी, सब लोग इस अभियान से जुड़ गये झाड़ू चुनाव चिन्ह वाले आप पार्टी के प्रमुख
अरविन्द केजरीवाल ने भी सफाई अभियान में भागीदारी की हम सभी लोगों ने भी झाडू़
लगाकर एवं गंदगी हटा कर सफाई अभियान में अपना योगदान दिया हमें वायु प्रदूषण रोकने के लिए
सीएनजी व एलपीजी गैसों व इलेक्ट्रॉनिक बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग करना होगा. साथ ही, वाहनों में प्रदूषण की नियमित जांच करानी होगी. प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोक लगे, फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं
की भी हमें समुचित व्यवस्था करनी होगी. हमें अम्लीय वर्षा रोकने का प्रयास करना होगा, ग्रीन हाउस गैसों को
नियंत्रित करना होगा. एसी, फ्रिज से निकलने वाली ओजोन गैस पर नियंत्रण लगाना होगा जिससे ओजोन छिद्र को कम
किया जा सके. शवों को खुले में
जलाने से वातावरण में फैलने वाले प्रदूषण को हमें विद्युत शवदाह ग्रह के माध्यम से
कम करना होगा। धार्मिक रीति-रिवाज के अनुरूप गंगा-यमुना में मृत पशुओं व बच्चों के
शवों को नही बहाना से होगा.
खुले में शौच करने वाली व्यवस्था को रोकना होगा. नदी तटों को तो इससे पूरी तरह
मुक्त करना होगा शौच से फैलने वाली गंदगी व प्रदूषण पर नियंत्रण लगाना स्वच्छ भारत
का पहला कदम होगा. सुलभ इंटरनेशनल द्वारा शौचालय के लिए जैसा प्रयास हुआ है वैसा ही प्रयास पूरे
भारत में किया जाए। सरकारी व निजी शौचालय न केवल बने वरन् उनका समुचित प्रयोग हो
सके इसके लिए प्रचार-प्रसार माध्यम से लोगों को जागरूक करना होगा। इससे महिला
सुरक्षा व स्वास्थ्य दोनों ही सुरक्षित हो सकेगा। साथ ही उ0 प्र0 के कुशीनगर की प्रियंका को अपने ससुराल से शौचालय के अभाव में वापस न लौटना
पड़े. भारत में कृषि कार्य
में प्रयुक्त मृदा में रासायनिक खाद व कीटनाशक का अत्यधिक प्रयोग मृदा की उर्वरता
को प्रभावित करता है, भूमि को बंजर बनाता है,
वहीं भूमिगत जल को भी प्रभावित करता है। नदी तट के गांवों
में रसायन का प्रयोग नदियों के जल को प्रभावित करता है। हमें रासायनिक खेती की जगह
जैविक एवं प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देना हेागा यह स्वच्छ भारत का एक और बड़ा कदम
होगा. ई-वेस्ट - आज के इस
दौर में गंदगी का एक बड़ा प्रारूप ई-वेस्ट से फैलने वाला कचरा भी है क्योंकि भारत
में मोबाइल, कम्प्यूटर आदि का कचरा दूर तक फैला रहता है इसका उचित निपटान नहीं हो पाता है।
कार्बन क्रेडिट की बात होती है पर यह लाभ कार्बन उत्पन्न करने वाली कम्पनियों को
ही कार्बन क्रेडिट के रूप में मिलता है। भारत में हम अभी भी इसे हटा नहीं पाए हैं
यह स्वच्छ भारत की एक बड़ी बाधा है. शहर में पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं जो मल-मूत्र, गंदगी आदि सड़क पर फैलाते हैं। नदियों में जाकर उसके पानी को प्रदूषित कर
डालते हैं। सड़क पर घूमने वाले गाय, बैल, भैंस, सांड, कुत्तों से फैलने वाली गंदगी हमें हर हाल में रोकनी होगी। सुअर भी गंदगी
फैलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं इन पर पाबंदी लगानी होगी। लावारिस पशुओं को पकड़ना
होगा और यदि उसका मालिक है तो उस पर बड़ी पेनल्टी लगानी होगी. गंदगी को दूर करने कई
प्रारूप हम देख रहे हैं उनमें ही हम ध्वनि प्रदूषण व शोर को भी देखते हैं जो कान
फोडू साउण्ड, डी0जे0, बैण्ड प्रेशर, हार्न व पटाखों के शोर से होता है। आज इस गंदगी ने लोगों का जीना मुश्किल कर
दिया है। पार्टियों में शोर की वजह से लोग बात भी नहीं कर पातें है। श्रवण शक्ति
के कई गुना अधिक डेसिबल का प्रयोग होता है। हम इसे कम नहीं कर पा रहे जो गंदगी के
रूप में हमे प्रभावित करता है। इसके शोर से हमें नियंत्रण पाना होगा नहीं तो मानसिक
अवसाद व चिढ़चिढ़ेपन से हम परेशान होते रहेंगे. शोर का एक बड़ा प्रारूप हमें पटाखों से देखने को मिलता है जो शादी विवाह मे
देर रात्रि तक बजता है। वहीं दीपावली जैसे पर्व पर तो प्रतिबन्धित पटाखे अरबों
रूपये के बजाए जाते है जिसका स्वरूप बडी गंदगी के रूप में दीपावली की अगली सुबह के
रूप में हम देखते है जो वातावरण को प्रदूषित कर अम्लीय वर्षा का भी कारक बनता है।
स्वच्छ भारत अगर बनाना है तो हमें आतिशबाजी बन्द कर उसे प्रतिबन्धित करना होगा. अब गंदगी फैलाने वाले
सारे कारकों में सबसे बड़ा कारक जो हमें देखने में छोटा लगता है पर पूरे भारत
विशेषकर उत्तर भारत को अपनी पूरी गिरफ्त में लिए है। जो थूकने की संस्कृति पिच-पिच
करने में हम भारतीय अपनी शान समझते हैं। एक तो हम साधारण थूक को सड़क पर थूकते हैं
वहीं दूसरी ओर रंगीन थूक से भी पूरे भारत के सार्वजनिक स्थलों, ऑफिस, बैंक आदि को थूक से रंगने में हम कहीं भी पीछे नहीं दिखते। इसका बड़ा कारण हम
तम्बाकू, गुटका, खैनी व पान के रूप में खाकर थूकते हैं। पान खाने वाला या गुटका खाने वाला उसे
घोंटता नहीं है उसे वह पीक बनाकर थूकता है कुछ लोग सभ्य बनकर उसे बेसिनों में कुछ
बाथरूम में या कुछ डस्टबिन में थूकते हैं पर यहां-जहां थूकते है वो स्थान गंदा ही
होता है। उत्तर भारत में बिहार, में तो हर 100 मीटर पर थूक पैदा करने वाली मशीन या गुमटी मिलती है. स्लाटर हाउस से फैलने वाले रक्त व चमड़े के कचरे को फैलने से रोकना होगा। मांस
का व्यवसाय खुले में न हो इसे भी रोकना होगा और अगर इससे गंदगी फैले तो हमें इसका
व्यवसाय करने वालों को दण्डित करना होगा . लोग पान खाते हैं, मुंह खोला व वहीं पिच मारी। लोग कार मोटर, रेल में चलते-चलते थूकते हैं जिससे
सड़क तो गंदी होती है कभी-कभी लोगों पर भी यह थूक पड़ती है। लोगों के कपड़े गंदे
हो जाते हैं। जब तक थूकने पर पेनल्टी व चालान नहीं लगेगा लोग नही मानेगें। बेचने वाले
व खाने वाले दोनों को बराबर का दोषी मानकर सजा देनी होगी। नहीं तो हम कितना भी
झाडू़ लगा ले कुछ नहीं होगा क्योंकि थूकने वालों की संख्या झाडू़ लगाने वालो से
ज्यादा है. हमारे प्रधानमंत्री जी
को आज कुछ करना है तो झाड़ू उठाने से पहले थूकने वालों के मुंह पर टेप लगाना होगा।
आज बड़े शान से गुटका खाकर लोग गंगा में थूकते है पर उन पर कोई कार्यवाही नहीं
होती। हमारे योग गुरू रामदेव कहते हैं कि सिंगापुर में च्यूइंग गम खाना भी जुर्म
है पर भारत में तो खईके पान बनारस वाले मुम्बई तक फैले हैं। इसे रोकने के लिए सख्त
कानून बनाना होगा। इसे राजस्व का साधन न मानकर पान, गुटका, सिगरेट, शराब सब पर सार्वजनिक रूप से ब्रिकी व खरीद पर साथ ही उपभोग पर रोक लगानी होगी. स्वच्छ भारत निर्माण
करना है तो पहली झाड़ू इन थूकने वाले अपराधियों पर चलाया जाए तो सड़क की गंदगी
वैसे ही दूर हो जाएगी। हर चीज में आधुनिक बनने वाले प्रधानमंत्री अगर डिजिटल
इण्डिया चाहते हैं तो पॉलिथीन, गुटका, सिगरेट, पान पर तत्काल पाबन्दी लगाएं और सड़क पर एवं गंगा में थूकने पर 500 रु0 का जुर्माना लगाएं और पकड़े जाने पर 6 माह की कठोर कारावास की सजा भी
हो। हमें प्रधानमंत्री जी से एक निवेदन करना है कि जैसे स्वास्थ्य के लिए सीजीएचएस
है वैसे ही केन्द्रीय सफाईकर्मी नियुक्त करने होंगे और सफाई व्यवस्था को नगर निगम
को देने से बचना होगा क्योंकि नगर निगम तो राजनीतिक अखाड़ा है, पार्षद व मेयर तो राजनीति करते हैं। नगर आयुक्त एवं अन्य पर्यावरण इंजीनियर
चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। बाकी भ्रष्टाचार अपना काम करता है। एक सक्षम सफाई की
टीम बनानी होगी। एनजीओ को महत्व देना होगा, उनकी आईबी से जांच कराने की जगह
उनके कार्यो की गुणवत्ता देख उन्हें मानदेय देखकर इस अभियान से जोड़ना होगा। अगर हमें
थूकने वाले पर रोक लगानी है तो हर गली मुहल्ले में चालान करने वाले वॉलन्टियर्स
बनाने होंगे। इस कार्य में सीनियर सिटिजन को जोड़ना होगा. हर शहर में फैलने वाले कचरे का
डिस्पोज न केवल खाद बनाने में हों वरन उसे भविष्य के फ्यूल के रूप में भी बनाना
होगा। इसकी शुरूआत जेपी ग्रुप ने पंजाब के चंडीगढ़ में किया है। उसे पूरे देश में, हर बड़े शहरों में लागू करना होगा जिससे शहर की सारी गंदगी नष्ट हो जाएगी और
यह सस्ता ईंधन भी उपलब्ध कराएगा। सारे देश के म्यूनीसीपल कॉर्पोरेशन के चेयरमैन को
चंडीगढ़ शहर का उदाहरण लेना होगा जो भारत में स्वच्छता में नम्बर वन जिला है।
हरियाली से भरा चारों तरफ सफाई दिखती है क्योंकि लोग यहां सफाई पर बल देते हैं
जहां देखों वहीं दुकान खोलना या सड़क पर रेहड़ी नहीं लगती है. हमें गंदगी हटानी है तो जलवायु
परिवर्तन, जल, वायु, ध्वनि सभी प्रकार के प्रदूषण रोकने होंगे। हमें सक्षम एवं समग्र रूप से रोक
लगानी होगी। हमें झाडू़ के साथ-साथ झाड़ू न लगाने पर भी बल देना होगा। यहां दण्ड
के स्वरूप को मजबूत बनाना होगा। नहीं तो हम गांधी जी की 150वीं जयंती क्या 200वीं जयंती भी मना लें हम भारत को गंदगी में मुक्ति नहीं दिला पाएंगे। जैसे कि
सर्वोच्च न्यायालय का गंगा के सन्दर्भ में कहना है कि यही प्रयास रहा तो गंगा 200 साल में भी प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकेगी। प्रधानमंत्री मोदी जी चाहे मेडिसिन
स्केवअर, अमेरिका में जा कर गंगा की सफाई की बात करें या जापान जाकर गंगा को साफ करने
का सहयोग मांगें हम गंगा को प्रदूषण मुक्त नहीं कर पाएंगें। हमें पहले गंदगी
फैलाने वालों को रोकना होगा। चाहे जन-जागरूकता कितनी ही हो पर उसमें हमें दण्ड के
स्वरूप को भी शामिल करना होगा। पॉलिथीन का प्रयोग करने वाले को पकड़ने वाले पर 500 रुपए का तत्काल जुर्माना लगे। पॉलिथीन को माइक्रॉन के जाल में न उलझाकर उसकी
बिक्री पर रोक लगानी होगी। गुटका व तम्बाकू प्रतिबंधित करना होगा न कि पाउच पर
सांप, बिच्छू का चित्र बना कर झूठा डर पैदा करने का दिखावा करना। इससे भरत स्वच्छ
नही होगा. हमें दोहरी नीति नहीं
अपनानी होगी कि हम सड़क पर गुटका खाकर थूकें और हमारे स्कूल के बच्चे या नौकरी
करने वाले या स्वयंसेवी संस्था के लोग गांधीवादी बन झाड़ू ले उसे साफ करते फिरें, यह उचित नहीं है। हम गंदगी न करने की कसम लेते हैं और लोगों से भी न करने को
कहेंगे, न मानने पर पेनल्टी लेने की टोल-फ्री व्यवस्था होनी चाहिए। हां, चालान पुलिस के हाथों में न होकर इसे सीनियर सीटिजन या स्वंयसेवी संस्थाओं के
हवाले किया जाए जिन्हें पुलिस प्रोटेक्शन मिलनी चाहिए। जो लोग पेनल्टी लेने वालों
की बात न माने, इनकी शिकायत पर पुलिस द्वारा कार्यवाही की जाए. हमें प्रदूषण रोकने एवं सफाई कार्य को स्कूली स्तर पर लेना होगा ।बेसिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा में इसे कोर्स में डाला जाए एवं प्रेक्टिकल मार्क्स
में जोड़ा जाए। एनएसएस, एनसीसी एवं स्काउट में इसे लिया जाए। बच्चों व महिलाओं को बायो-डिग्रेडेबल व
नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे के बारे में बताया जाए और दोनों कचरे को एकट्ठा करने के
लिए अलग-अलग डस्टबिन घर से लेकर स्कूल, कॉलेज व सार्वजनिक स्थल पर रखे
जाएं। उसका निपटान दो बार किया जाए एक बार सुबह व दूसरी बार शाम को। कानून का राज
स्थापित हो। लोगों की सोच पर झाड़ू लगा कर उन्हें सफाईयुक्त यानी स्वच्छ भारत
निर्माण कराने की ओर अग्रसर कर डिजिटल इण्डिया और मेक इन इण्डिया की अवधारणा को
साकार करना होगा। हर घर हर स्कूल एवं हर गांव को शौचालय सुविधा देनी होगी। तभी हम
प्रदूषण मुक्त स्वच्छभारत का निर्माण कर सकेंगे ……
