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डॉ ज़ाकिर  हुसैन स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति .

डॉ ज़ाकिर हुसैन स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति .

.  दिन विशेष . 



डाक्टर ज़ाकिर हुसैन ( 8 फरवरी, 1897 - 3 मई, 1969 ) भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे जिनका कार्यकाल 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक था. डा. ज़ाकिर हुसैन का जन्म 8 फ़रवरी, 1897 ई. में हैदराबाद, आंध्र प्रदेश के धनाढ्य पठान परिवार में हुआ था कुछ समय बाद इनके पिता उत्तर प्रदेश में रहने आ गये थे . केवल 23 वर्ष की अवस्था में वे 'जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय' की स्थापना दल के सदस्य बने. जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति तथा प्रमुख शिक्षाविद थे वे अर्थशास्त्र में पीएच. डी की डिग्री के लिए जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय गए और लौट कर जामिया के उप कुलपति के पद पर भी आसीन हुए 1920 में उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना में योग दिया तथा इसके उपकुलपति बने इनके नेतृत्व में जामिया मिलिया इस्लामिया का राष्ट्रवादी कार्यों तथा स्वाधीनता संग्राम की ओर झुकाव रहा. स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने तथा उनकी अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोगभी गठित किया गया इसके अलावा वे भारतीय प्रेस आयोग, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूनेस्को, अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा सेवा तथा केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से भी जुड़े रहे 1962 ई. में वे भारत के उपराष्ट्रपति बने उन्हें वर्ष 1963 मे भारत रत्न से सम्मानित किया गया 1969 में असमय देहावसान के कारण वे अपना राष्ट्रपति कार्यकाल पूरा नहीं कर सके डॉ॰ जाकिर हुसैन भारत में आधुनिक शिक्षा के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे और उन्होंने अपने नेतृत्व में जामिया मिलिया इस्लामिया के नाम से एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में नई दिल्ली में मौजूद को स्थापित किया, जहाँ से हजारों छात्र प्रत्येक वर्ष अनेक विषयों में शिक्षा ग्रहण करते हैं डॉ॰ जाकिर हुसैन ने बिहार के राज्यपाल के रूप में भी सेवा की थी और इसके बाद वे अपना राजनीतिक कैरियर समाप्त होने से पहले वे देश के उपराष्ट्रपति रहे तथा बाद में वे भारत के तीसरे राष्ट्रपति भी बने. डॉ॰ जाकिर हुसैन उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए थे .

परन्तु जल्द ही वे भारत लौट आये
वापस आकर उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया को अपना शैक्षणिक और प्रशासनिक नेतृत्व प्रदान किया विश्वविद्यालय वर्ष 1927 में बंद होने के कगार पर पहुँच था, लेकिन डॉ॰ जाकिर हुसैन के प्रयासों की वजह यह शैक्षिक संस्थान अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब रहा था उन्होंने लगातार अपना समर्थन देना जारी रखा, इस प्रकार उन्होंने इक्कीस वर्षों तक संस्था को अपना शैक्षिक और प्रबंधकीय नेतृत्व प्रदान किया उनके प्रयासों की वजह से इस विश्वविद्यालय ने ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के लिए संघर्ष में योगदान दिया एक शिक्षक के रूप में डॉ॰ जाकिर हुसैन ने महात्मा गांधी और हाकिम अजमल खान के आदर्शों को प्रचारित किया उन्होंने वर्ष 1930 के दशक के मध्य तक देश के कई शैक्षिक सुधार आंदोलन में एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया. डॉ॰ जाकिर हुसैन स्वतंत्र भारत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति (पहले इसे एंग्लो-मुहम्मडन ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था) चुने गए वाइस चांसलर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ॰ जाकिर हुसैन ने पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश बनाने की मांग के समर्थन में इस संस्था के अन्दर कार्यरत कई शिक्षकों को ऐसा करने से रोकने में सक्षम हुए. डॉ॰ जाकिर हुसैन को वर्ष 1954 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. डॉ॰ जाकिर हुसैन को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में अपने कार्यकाल के अंत में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था. इस प्रकार वे वर्ष 1956 में भारतीय संसद के सदस्य बन गये वे केवल एक वर्ष के लिए बिहार के राज्यपाल बनाए, पर बाद में वे पांच वर्ष (1957 से 1962) तक इस पद पर बने रहे. जाकिर हुसैन को उनके कार्यों को देखते हुआ वर्ष 1963 में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, इलाहाबाद और काहिरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें उन्होंने डि-लिट् (मानद) उपाधि से सम्मानित किया था राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के अंत के साथ ही डॉ॰ जाकिर हुसैन पांच वर्ष की अवधि के लिए देश के दूसरे उप-राष्ट्रपति चुने गए उन्होंने 13 मई, 1967 को राष्ट्रपति पद ग्रहण किया इस प्रकार वे भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बने वे डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद राष्ट्रपति पद पर पहुचने वाले तीसरे राजनीतिज्ञ थे .

डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन बेहद अनुशासनप्रिय व्यक्तित्त्व के धनी थे उनकी अनुशासनप्रियता नीचे दिये प्रसंग से समझा जा सकता है। यह प्रसंग उस समय का है, जब डॉ॰ जाकिर हुसैन जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति थे जाकिर हुसैन बेहद ही अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे वे चाहते थे कि जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र अत्यंत अनुशासित रहें, जिनमें साफ-सुथरे कपड़े और पॉलिश से चमकते जूते होना सर्वोपरि था इसके लिए डॉ॰ जाकिर हुसैन ने एक लिखित आदेश भी निकाला, किंतु छात्रों ने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया. छात्र अपनी मनमर्जी से ही चलते थे, जिसके कारण जामिया विश्वविद्यालय का अनुशासन बिगड़ने लगा. यह देखकर डॉ॰ हुसैन ने छात्रों को अलग तरीके से सुधारने पर विचार किया एक दिन वे विश्वविद्यालय केदरवाज़े पर ब्रश और पॉलिश लेकर बैठ गए और हर आने-जाने वाले छात्र के जूते ब्रश करने लगे. यह देखकर सभी छात्र बहुत लज्जित हुए उन्होंने अपनी भूल मानते हुए डॉ॰ हुसैन से क्षमा मांगी और अगले दिन से सभी छात्र साफ-सुथरे कपड़ों में और जूतों पर पॉलिश करके आने लगे इस तरह विश्वविद्यालय में पुन: अनुशासन कायम हो गया. डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन भारत के राष्ट्रपति बनने वाले पहले मुसलमान थे देश के युवाओं से सरकारी संस्थानों का वहिष्कार की गाँधी की अपील का हुसैन ने पालन किया उन्होंने अलीगढ़ में मुस्लिम नेशनल यूनिवर्सिटी (बाद में दिल्ली ले जायी गई)

की स्थापना में मदद की और
1926 से 1948 तक इसके कुलपति रहे महात्मा गाँधी के निमन्त्रण पर वह प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष भी बने, जिसकी स्थापना 1937 में स्कूलों के लिए गाँधीवादी पाठ्यक्रम बनाने के लिए हुई थी. 1948 में हुसैन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति बने और चार वर्ष के बाद उन्होंने राज्यसभा में प्रवेश किया. 1956-58 में वह संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति संगठन (यूनेस्को) की कार्यकारी समिति में रहे. 1957 में उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया और 1962 में वह भारत के उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए. 1967 में कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में वह भारत के राष्ट्रपति पद के लिए चुने गये और मृत्यु तक पदासीन रहे. . . . . 

लेखक मोईज़ शेख 
शर्मसार करती भुखमरी ……….

शर्मसार करती भुखमरी ……….

12 अक्टूबर को जारी हुई वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआई) की रिपोर्ट सोशल मीडिया पर सबसे ज्यावदा चर्चा की विषय बन गई. रिपोर्ट में बताया गया कि भारत, भुखमरी सूचकांक में और नीचे आ गया है अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) के बयान में कहा गया-भारत का स्थान 119 देशों में 100वें नंबर पर है, और उसे पूरे एशिया में तीसरा सबसे ज्यादा स्कोर मिला है.  केवल अफगानिस्तारन और पाकिस्ता न की रैंकिंग ही सबसे खराब हैरिपोर्ट में आगे कहा गया है, ”31.4 के साथ, भारत का 2017 जीएचआई (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) स्कोगर गंभीरश्रेणी के उच्चर सिरे पर है और यह इस वर्ष जीएचआई में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले क्षेत्र की श्रेणी में दक्षिण एशिया के पिछड़ने का एक मुख्य कारण है, इस श्रेणी में दक्षिण एशिया, सहारा के दक्षिण अफ्रीका से कुछ ही पीछे है.  इस समाचार की रिपोर्टिंग सभी मुख्य  मीडिया हाउस द्वारा की गई, ये खबर निश्चित ही चिंता बढ़ाने वाली है. कि पिछले साल की तुलना में वैश्विक भुखमरी सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स- जीएचआई) में भारत तीन पायदान नीचे उतर गया है वर्ष 2016 में इस सूचकांक में भारत 119 देशों में 97वें स्थान पर था. अब 100वें नंबर पर है , क्या यह तथ्य हमारे लिए गहरी चिंता का कारण नहीं होना चाहिए कि इस सूचकांक में उत्तर कोरिया, बांग्लादेश और इराक जैसे देश भी भारत से ऊपर रहे हैं  जीएचआई चार संकेतकों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाता है.
 


ये हैं- आबादी में कुपोषणग्रस्त लोगों की संख्या, बाल मृत्युदर, अविकसित बच्चों की संख्या और अपनी उम्र की तुलना में छोटे कद और कम वजन वाले बच्चों की तादाद वॉशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) द्वारा तैयार भुखमरी सूचकांक में भारत पहले से काफी नीचे आता रहा है. न्‍यूज़ रिपोर्ट के अनुसार जिनमें यह भी बताया गया कि भारत की जीएचआई रैंक 45 स्थान नीचे आ गई हैं, मैंने प्रधानमंत्री मोदी जी की आर्थिक सलाहकार परिषद के वर्तमान अध्‍यक्ष श्री बिबेक देवरॉय को टैग करते हुए एक ट्वीट किया. इसकी प्रमुख वजह यहां कुपोषणग्रस्त बच्चों की बड़ी संख्या है. भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती दो अर्थव्यवस्थाओं में एक है. दुनिया की एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में आज इसकी प्रतिष्ठा है. इसके बावजूद भुखमरी सूचकांक में इतना पीछे होना हम सबके लिए गहरे आत्म-मंथन का विषय होना चाहिए. अधिक फिक्र की बात इस मोर्चे पर अपने देश का इस वर्ष और पिछड़ जाना है. नरेंद्र मोदी सरकार ने जन-कल्याण के कार्यक्रमों को प्रभावी और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने पर खास ध्यान दिया है. उसने सत्ता में आने के बाद विकास नीति पर नया नजरिया अपनाया. उसका जोर राज्यों को सशक्त करने पर रहा है. सोच यह है कि राज्य सरकारें अपनी खास जरूरतों के मुताबिक कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर स्वरूप देंगी और उन्हें अधिक उत्तरदायित्व के साथ लागू करेंगी. लेकिन इस बीच आखिर कहां चूक हो रही है. समस्या नीतिगत है या खामी अमल में है, इसका अविलंब ठोस आकलन किया जाना चाहिए.आईएफपीआरआई ने एक खास मसले की तरफ ध्यान खींचा है. उसने जिक्र किया है कि भारत की एक फीसदी आबादी के पास देश के कुल धन का आधे से ज्यादा हिस्सा है. इस विषमता का अर्थ यह है कि देश में जो धन पैदा होता है, उसका ज्यादा हिस्सा कुछ हाथों में सिमट जाता है.


यानी देश भले लगातार धनी हो रहा हो, लेकिन उसका लाभ सभी तबकों को नहीं मिल रहा है. इस कारण भारतीय जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा बुनियादी सुविधाओं और अवसरों से वंचित बना हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि सरकार ने सबको पोषण उपलब्ध कराने के कार्यक्रम बड़े पैमाने पर चलाए हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं तथा कई तरह की व्यवस्थागत समस्याओं के कारण इनके लाभ देश के सभी हिस्सों और तबकों तक नहीं पहुंच पाते. ये ऐसे अप्रिय तथ्य हैं, जिन पर सरकारों को तुरंत ध्यान देना होगा. उन्हें समझना होगा कि जीएचआई जैसे पैमानों पर देश की खराब छवि उभरती रही, तो दूसरे क्षेत्रों की तमाम उपलब्धियों पर ग्रहण लगा रहेगा. देश की समूची आबादी को सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को पूरा करने हेतु अनिवार्य है.
एक कदम स्वच्छ की और . .

एक कदम स्वच्छ की और . .

हमें स्वच्छ भारत बनाना है पर हम सिर्फ झाड़ू लगाकर भारत को स्वच्छ नहीं बना सकेंगे. हमें अपनी सोच बदलनी होगी, हमें ऐसा माहौल बनाना होगा कि सड़क पर कचरा ही न फैले हमें झाड़ू लगाने की नौबत ही न पड़े इसके लिए हमें नैतिक बल तो दिखाना होगा साथ ही हमें इसके लिए दण्डात्मक व्यवस्था भी लगानी होगी क्योंकि जब हम भारत में मेट्रो स्टेशन पर थूकने पर 200 रुपए के जुर्माने का बोर्ड पढ़ते है तो हम थूक आने पर भी अपनी थूक गटक जाते हैं. हम सिंगापुर एवं अन्य देशों का उदाहरण देखते हैं कि वहां पर गंदगी फैलाने पर कितना जुर्माना लगता है. यानी कुल मिलाकर हमें भारत को स्वच्छ बनाना है पर यह गंदगी व प्रदूषण झाडू़ से नहीं, स्वयं की सोच सफाई के लिए बना कर प्रयास करना होगा. आइए हम देखे कि कैसे होगा हमारा भारत स्वच्छ  हमें सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जल और वायु को सबसे पहले स्वच्छ बनाना होगा. हम जैसे एक्वागार्ड लगाकर घर में पानी साफ कर लेते हैं वैसा ही प्रयास हमें सार्वजनिक पानी के स्रोतों की स्वच्छता पर देना होगा - हमें नदियो- गंगा, यमुना एवं अन्य जल को प्रदूषण मुक्त बनाना होगा इसके लिए पहला सार्थक प्रयास यह होगा कि हम स्वयं कचरा न डालें पूजन सामग्री, घर की मूर्तियां या प्लास्टर ऑफ पेरिस व केमिकल युक्त दुर्गा, गणेश प्रतिमा नदियों में विसर्जित न करें वहीं बड़े स्तर पर उद्योगों का अपशिष्ट, सीवर का गंदा पानी, नदियों में जाने से रोकें एसटीपी व ईटीपी व्यवस्था को बेहतर कर पानी को शोधित कर उसे सिंचाई में प्रयुक्त करें .   स्वच्छ भारत अभियान के लिए जो एक और अनिवार्य व बड़ा कदम है वह है, ठोस अपशिष्ट का निपटान करना जिसमें हम सबसे बड़े रूप में प्लास्टिक व पॉलिथीन को ले सकते है. आज पॉलिथीन संस्कृति की सस्ती सुविधा ने मनुष्य को सिर से पांव तक पॉलिथीन में कैद कर लिया है खाने-पीने का समान हो- दूध, दही, चाय, घी, सब्जी, आटा, चावल, दाल सब इसमें ही पैक है इसने झोला संस्कृति को नष्ट कर दिया है लोग पॉलिथीन का प्रयोग कर इसे नालियों में फेंक देते हैं जो नालियों को जाम कर देता है जिससे बारिश में मुहल्लों में पानी भर जाता हैं वही ये बहकर गंगा यमुना एवं अन्य नदियों को प्रदूषित कर इनके तटों को गंदा करते हैं और नदियों के प्रवाह को भी प्रभावित करते हैं. पॉलिथीन भूमिगत जल स्रोत को भी प्रभावित करता है. और जिस सफाई की बात आज हो रही है उस गंदगी का 80 प्रतिशत पॉलिथीन की वजह से ही है क्योंकि बाकी गंदगी तो बायोडिग्रेडेबल है एंव नष्ट भी हो जाती है पर पॉलिथीन कचरा नॉन-बायोडिग्रेडेबल है जिसके कारण वह 100 साल में भी नष्ट नहीं होता और चारों तरफ फैला रहता है. नगर निगम जैसी सरकारी संस्था उसका सही से निपटान भी नहीं कर पाता है. स्वच्छ भरत के मार्ग का पॉलिथीन कचरा सबसे बड़ा रोड़ा है. भारत विकासशील देश से विकसित देश की ओर तेजी से बढ़ रहा है. भारत गांवों का देश रहा है पर आज के संचार युग में भारत का पिछड़ा गांव भी ग्लोबल विलेज में बदल गया है. एक क्लिक पर भारत विश्व के किसी भी कोने से जुड़ जाता है.  भारत हर तरफ आगे बढ़ रहा है. बाजारवाद में भारत ने खुद को स्थापित कर लिया है पर भारत आज भी एक बड़ी चीज से निजात नहीं पा सका है जिसे गंदगी कहें, कचरा या प्रदूषण भारत के जिस भी हिस्से में हम देखें हमें गंदगी का अम्बार दिखाई देता है भारत में हर चीज के लिए बड़े-बड़े आंदोलन व धरने देखने को मिलते रहे हैं पर गंदगी को हमने छोटा समझा इसके लिए छोटे-छोटे स्तर पर प्रदूषण के खिलाफ तो आवाज उठी पर समग्र रूप में गंदगी को दूर करने का प्रयास नहीं हुआ था  महात्मा गांधी जिन्हें आदर्श माना जाता है वो गंदगी के खिलाफ थे वो स्वयं सफाई अभियान करते थे पर उनकी सोच भी सम्पूर्णता नहीं पा सकी क्योंकि वो अपने आश्रम व घर को तो साफ करते थे उन्होंने भारत को अंग्रेजों से तो मुक्त करा दिया पर गंदगी से वो भी भारत को मुक्त नहीं करा पाए न ही गंदगी को राष्ट्रव्यापी आंदोलन बना सकें  2014 में भारत में एक युग का परिवर्तन होता है और राजनीतिक शिखर पर एक बड़ा नाम नरेन्द्र मोदी के रूप उभरा और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर भाजपा के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनाई और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने सरदार पटेल, महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय जैसे आदर्शों को सामने रख कर कार्य करने का निर्णय लिया और 15 अगस्त को लाल किले से उन्होंने सबसे बड़ा संदेश जो दिया उससे पूरे देश में शौचालय बनाने पर बल दिया और महिलाओं व बच्चियों के लिए अलग से शौचालय निर्माण की बात की साथ ही उन्होंने महात्मा गांधी के आदर्श को सामने रख कर भारत को गंदगी मुक्त करने का अभियान शुरू करने की बात की और 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान का शुभारम्भ कर दिया जिसमें उन्होंने 2019 तक कचरा मुक्त भारत बनाने का संदेश दिया इस कार्य को बड़ा रूप देने के लिए उन्होंने सचिन तेन्दुलकर, अनिल अम्बानी, सलमान खान, शशि थरूर सरीखे 9 लोगों को चयनित कर ऐसे ही 9 का दल बनाने की बात की और उन्होंने स्वयं वाल्मिकी आश्रम में झाडू़ लगाकर अभियान शुरू किया और देखते-देखते उनके सभी मंत्री, केन्द्रीय कर्मचारी, सब लोग इस अभियान से जुड़ गये झाड़ू चुनाव चिन्ह वाले आप पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने भी सफाई अभियान में भागीदारी की हम सभी लोगों ने भी झाडू़ लगाकर एवं गंदगी हटा कर सफाई अभियान में अपना योगदान दिया  हमें वायु प्रदूषण रोकने के लिए सीएनजी व एलपीजी गैसों व इलेक्ट्रॉनिक बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग करना होगा. साथ ही, वाहनों में प्रदूषण की नियमित जांच करानी होगी. प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोक लगे, फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं की भी हमें समुचित व्यवस्था करनी होगी. हमें अम्लीय वर्षा रोकने का प्रयास करना होगा, ग्रीन हाउस गैसों को नियंत्रित करना होगा. एसी, फ्रिज से निकलने वाली ओजोन गैस पर नियंत्रण लगाना होगा जिससे ओजोन छिद्र को कम किया जा सके. शवों को खुले में जलाने से वातावरण में फैलने वाले प्रदूषण को हमें विद्युत शवदाह ग्रह के माध्यम से कम करना होगा। धार्मिक रीति-रिवाज के अनुरूप गंगा-यमुना में मृत पशुओं व बच्चों के शवों को नही बहाना से होगा. खुले में शौच करने वाली व्यवस्था को रोकना होगा. नदी तटों को तो इससे पूरी तरह मुक्त करना होगा शौच से फैलने वाली गंदगी व प्रदूषण पर नियंत्रण लगाना स्वच्छ भारत का पहला कदम होगा. सुलभ इंटरनेशनल द्वारा शौचालय के लिए जैसा प्रयास हुआ है वैसा ही प्रयास पूरे भारत में किया जाए। सरकारी व निजी शौचालय न केवल बने वरन् उनका समुचित प्रयोग हो सके इसके लिए प्रचार-प्रसार माध्यम से लोगों को जागरूक करना होगा। इससे महिला सुरक्षा व स्वास्थ्य दोनों ही सुरक्षित हो सकेगा। साथ ही उ0 प्र0 के कुशीनगर की प्रियंका को अपने ससुराल से शौचालय के अभाव में वापस न लौटना पड़े. भारत में कृषि कार्य में प्रयुक्त मृदा में रासायनिक खाद व कीटनाशक का अत्यधिक प्रयोग मृदा की उर्वरता को प्रभावित करता है, भूमि को बंजर बनाता है, वहीं भूमिगत जल को भी प्रभावित करता है। नदी तट के गांवों में रसायन का प्रयोग नदियों के जल को प्रभावित करता है। हमें रासायनिक खेती की जगह जैविक एवं प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देना हेागा यह स्वच्छ भारत का एक और बड़ा कदम होगा. ई-वेस्ट - आज के इस दौर में गंदगी का एक बड़ा प्रारूप ई-वेस्ट से फैलने वाला कचरा भी है क्योंकि भारत में मोबाइल, कम्प्यूटर आदि का कचरा दूर तक फैला रहता है इसका उचित निपटान नहीं हो पाता है। कार्बन क्रेडिट की बात होती है पर यह लाभ कार्बन उत्पन्न करने वाली कम्पनियों को ही कार्बन क्रेडिट के रूप में मिलता है। भारत में हम अभी भी इसे हटा नहीं पाए हैं यह स्वच्छ भारत की एक बड़ी बाधा है. शहर में पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं जो मल-मूत्र, गंदगी आदि सड़क पर फैलाते हैं। नदियों में जाकर उसके पानी को प्रदूषित कर डालते हैं। सड़क पर घूमने वाले गाय, बैल, भैंस, सांड, कुत्तों से फैलने वाली गंदगी हमें हर हाल में रोकनी होगी। सुअर भी गंदगी फैलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं इन पर पाबंदी लगानी होगी। लावारिस पशुओं को पकड़ना होगा और यदि उसका मालिक है तो उस पर बड़ी पेनल्टी लगानी होगी. गंदगी को दूर करने कई प्रारूप हम देख रहे हैं उनमें ही हम ध्वनि प्रदूषण व शोर को भी देखते हैं जो कान फोडू साउण्ड, डी0जे0, बैण्ड प्रेशर, हार्न व पटाखों के शोर से होता है। आज इस गंदगी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। पार्टियों में शोर की वजह से लोग बात भी नहीं कर पातें है। श्रवण शक्ति के कई गुना अधिक डेसिबल का प्रयोग होता है। हम इसे कम नहीं कर पा रहे जो गंदगी के रूप में हमे प्रभावित करता है। इसके शोर से हमें नियंत्रण पाना होगा नहीं तो मानसिक अवसाद व चिढ़चिढ़ेपन से हम परेशान होते रहेंगे. शोर का एक बड़ा प्रारूप हमें पटाखों से देखने को मिलता है जो शादी विवाह मे देर रात्रि तक बजता है। वहीं दीपावली जैसे पर्व पर तो प्रतिबन्धित पटाखे अरबों रूपये के बजाए जाते है जिसका स्वरूप बडी गंदगी के रूप में दीपावली की अगली सुबह के रूप में हम देखते है जो वातावरण को प्रदूषित कर अम्लीय वर्षा का भी कारक बनता है। स्वच्छ भारत अगर बनाना है तो हमें आतिशबाजी बन्द कर उसे प्रतिबन्धित करना होगा. अब गंदगी फैलाने वाले सारे कारकों में सबसे बड़ा कारक जो हमें देखने में छोटा लगता है पर पूरे भारत विशेषकर उत्तर भारत को अपनी पूरी गिरफ्त में लिए है। जो थूकने की संस्कृति पिच-पिच करने में हम भारतीय अपनी शान समझते हैं। एक तो हम साधारण थूक को सड़क पर थूकते हैं वहीं दूसरी ओर रंगीन थूक से भी पूरे भारत के सार्वजनिक स्थलों, ऑफिस, बैंक आदि को थूक से रंगने में हम कहीं भी पीछे नहीं दिखते। इसका बड़ा कारण हम तम्बाकू, गुटका, खैनी व पान के रूप में खाकर थूकते हैं। पान खाने वाला या गुटका खाने वाला उसे घोंटता नहीं है उसे वह पीक बनाकर थूकता है कुछ लोग सभ्य बनकर उसे बेसिनों में कुछ बाथरूम में या कुछ डस्टबिन में थूकते हैं पर यहां-जहां थूकते है वो स्थान गंदा ही होता है। उत्तर भारत में बिहार,  में तो हर 100 मीटर पर थूक पैदा करने वाली मशीन या गुमटी मिलती हैस्लाटर हाउस से फैलने वाले रक्त व चमड़े के कचरे को फैलने से रोकना होगा। मांस का व्यवसाय खुले में न हो इसे भी रोकना होगा और अगर इससे गंदगी फैले तो हमें इसका व्यवसाय करने वालों को दण्डित करना होगा . लोग पान खाते हैं, मुंह खोला व वहीं पिच मारी। लोग कार मोटर, रेल में चलते-चलते थूकते हैं जिससे सड़क तो गंदी होती है कभी-कभी लोगों पर भी यह थूक पड़ती है। लोगों के कपड़े गंदे हो जाते हैं। जब तक थूकने पर पेनल्टी व चालान नहीं लगेगा लोग नही मानेगें। बेचने वाले व खाने वाले दोनों को बराबर का दोषी मानकर सजा देनी होगी। नहीं तो हम कितना भी झाडू़ लगा ले कुछ नहीं होगा क्योंकि थूकने वालों की संख्या झाडू़ लगाने वालो से ज्यादा है. हमारे प्रधानमंत्री जी को आज कुछ करना है तो झाड़ू उठाने से पहले थूकने वालों के मुंह पर टेप लगाना होगा। आज बड़े शान से गुटका खाकर लोग गंगा में थूकते है पर उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती। हमारे योग गुरू रामदेव कहते हैं कि सिंगापुर में च्‍यूइंग गम खाना भी जुर्म है पर भारत में तो खईके पान बनारस वाले मुम्बई तक फैले हैं। इसे रोकने के लिए सख्त कानून बनाना होगा। इसे राजस्व का साधन न मानकर पान, गुटका, सिगरेट, शराब सब पर सार्वजनिक रूप से ब्रिकी व खरीद पर साथ ही उपभोग पर रोक लगानी होगी. स्वच्छ भारत निर्माण करना है तो पहली झाड़ू इन थूकने वाले अपराधियों पर चलाया जाए तो सड़क की गंदगी वैसे ही दूर हो जाएगी। हर चीज में आधुनिक बनने वाले प्रधानमंत्री अगर डिजिटल इण्डिया चाहते हैं तो पॉलिथीन, गुटका, सिगरेट, पान पर तत्काल पाबन्दी लगाएं और सड़क पर एवं गंगा में थूकने पर 500 रु0 का जुर्माना लगाएं और पकड़े जाने पर 6 माह की कठोर कारावास की सजा भी हो। हमें प्रधानमंत्री जी से एक निवेदन करना है कि जैसे स्वास्थ्य के लिए सीजीएचएस है वैसे ही केन्द्रीय सफाईकर्मी नियुक्त करने होंगे और सफाई व्यवस्था को नगर निगम को देने से बचना होगा क्योंकि नगर निगम तो राजनीतिक अखाड़ा है, पार्षद व मेयर तो राजनीति करते हैं। नगर आयुक्त एवं अन्य पर्यावरण इंजीनियर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। बाकी भ्रष्टाचार अपना काम करता है। एक सक्षम सफाई की टीम बनानी होगी। एनजीओ को महत्व देना होगा, उनकी आईबी से जांच कराने की जगह उनके कार्यो की गुणवत्ता देख उन्हें मानदेय देखकर इस अभियान से जोड़ना होगा। अगर हमें थूकने वाले पर रोक लगानी है तो हर गली मुहल्ले में चालान करने वाले वॉलन्टियर्स बनाने होंगे। इस कार्य में सीनियर सिटिजन को जोड़ना होगा. हर शहर में फैलने वाले कचरे का डिस्पोज न केवल खाद बनाने में हों वरन उसे भविष्य के फ्यूल के रूप में भी बनाना होगा। इसकी शुरूआत जेपी ग्रुप ने पंजाब के चंडीगढ़ में किया है। उसे पूरे देश में, हर बड़े शहरों में लागू करना होगा जिससे शहर की सारी गंदगी नष्ट हो जाएगी और यह सस्ता ईंधन भी उपलब्ध कराएगा। सारे देश के म्यूनीसीपल कॉर्पोरेशन के चेयरमैन को चंडीगढ़ शहर का उदाहरण लेना होगा जो भारत में स्वच्छता में नम्बर वन जिला है। हरियाली से भरा चारों तरफ सफाई दिखती है क्योंकि लोग यहां सफाई पर बल देते हैं जहां देखों वहीं दुकान खोलना या सड़क पर रेहड़ी नहीं लगती है. हमें गंदगी हटानी है तो जलवायु परिवर्तन, जल, वायु, ध्वनि सभी प्रकार के प्रदूषण रोकने होंगे। हमें सक्षम एवं समग्र रूप से रोक लगानी होगी। हमें झाडू़ के साथ-साथ झाड़ू न लगाने पर भी बल देना होगा। यहां दण्ड के स्वरूप को मजबूत बनाना होगा। नहीं तो हम गांधी जी की 150वीं जयंती क्या 200वीं जयंती भी मना लें हम भारत को गंदगी में मुक्ति नहीं दिला पाएंगे। जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय का गंगा के सन्दर्भ में कहना है कि यही प्रयास रहा तो गंगा 200 साल में भी प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकेगी। प्रधानमंत्री मोदी जी चाहे मेडिसिन स्केवअर, अमेरिका में जा कर गंगा की सफाई की बात करें या जापान जाकर गंगा को साफ करने का सहयोग मांगें हम गंगा को प्रदूषण मुक्त नहीं कर पाएंगें। हमें पहले गंदगी फैलाने वालों को रोकना होगा। चाहे जन-जागरूकता कितनी ही हो पर उसमें हमें दण्ड के स्वरूप को भी शामिल करना होगा। पॉलिथीन का प्रयोग करने वाले को पकड़ने वाले पर 500 रुपए का तत्काल जुर्माना लगे। पॉलिथीन को माइक्रॉन के जाल में न उलझाकर उसकी बिक्री पर रोक लगानी होगी। गुटका व तम्बाकू प्रतिबंधित करना होगा न कि पाउच पर सांप, बिच्छू का चित्र बना कर झूठा डर पैदा करने का दिखावा करना। इससे भरत स्वच्छ नही होगा. हमें दोहरी नीति नहीं अपनानी होगी कि हम सड़क पर गुटका खाकर थूकें और हमारे स्कूल के बच्चे या नौकरी करने वाले या स्वयंसेवी संस्था के लोग गांधीवादी बन झाड़ू ले उसे साफ करते फिरें, यह उचित नहीं है। हम गंदगी न करने की कसम लेते हैं और लोगों से भी न करने को कहेंगे, न मानने पर पेनल्टी लेने की टोल-फ्री व्यवस्था होनी चाहिए। हां, चालान पुलिस के हाथों में न होकर इसे सीनियर सीटिजन या स्वंयसेवी संस्थाओं के हवाले किया जाए जिन्हें पुलिस प्रोटेक्शन मिलनी चाहिए। जो लोग पेनल्टी लेने वालों की बात न माने, इनकी शिकायत पर पुलिस द्वारा  कार्यवाही की जाए. हमें प्रदूषण रोकने एवं सफाई कार्य को स्कूली स्तर पर लेना होगा ।बेसिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा में इसे कोर्स में डाला जाए एवं प्रेक्टिकल मार्क्‍स में जोड़ा जाए। एनएसएस, एनसीसी एवं स्काउट में इसे लिया जाए। बच्चों व महिलाओं को बायो-डिग्रेडेबल व नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे के बारे में बताया जाए और दोनों कचरे को एकट्ठा करने के लिए अलग-अलग डस्टबिन घर से लेकर स्कूल, कॉलेज व सार्वजनिक स्थल पर रखे जाएं। उसका निपटान दो बार किया जाए एक बार सुबह व दूसरी बार शाम को। कानून का राज स्थापित हो। लोगों की सोच पर झाड़ू लगा कर उन्हें सफाईयुक्त यानी स्वच्छ भारत निर्माण कराने की ओर अग्रसर कर डिजिटल इण्डिया और मेक इन इण्डिया की अवधारणा को साकार करना होगा। हर घर हर स्कूल एवं हर गांव को शौचालय सुविधा देनी होगी। तभी हम प्रदूषण मुक्त स्वच्छभारत का निर्माण कर सकेंगे  ……
टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान (1750 - 1799) कर्नाटक भारत के तत्कालीन मैसूर राज्य के शासक थे टीपू सुल्तान मैसूर कॆ सबसॆ महान शासक थॆ. टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) (बंगलौर से लगभग 33 (21 मील) किमी उत्तर मे) हुआ था. उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था. उनके पिता का नाम हैदर अली और माता का नाम फ़क़रुन्निसा था. उनके पिता हैदर अली मैसूर साम्राज्य के सैनापति थे. जो अपनी ताकत से 1761 मे मैसूर साम्राज्य के शासक बने. टीपू को मैसूर के शेर के रूप में जाना जाता है. योग्य शासक के अलावा टीपू एक विद्वान, कुशल़, य़ोग़य ,  सैनापति और कवि भी थे. टीपू सुल्तान ने हिंदू मन्दिरों को तोहफ़े पेश किए मेलकोट के मन्दिर में सोने और चांदी के बर्तन है, जिनके शिलालेख बताते हैं कि ये टीपू ने भेंट किए थे. ने कलाले के लक्ष्मीकान्त मन्दिर को चार रजत कप भेंटस्वरूप दिए थे. 1782 और 1799 के बीच, टीपू सुल्तान ने अपनी जागीर के मन्दिरों को 34 दान के सनद जारी किए. इनमें से कई को चांदी और सोने की थाली के तोहफे पेश किए. ननजनगुड के श्रीकान्तेश्वर मन्दिर में टीपू का दिया हुअ एक रत्न-जड़ित कप है. ननजनगुड के ही ननजुनदेश्वर मन्दिर को टीपू ने एक हरा-सा शिवलिंग भेंट किया. श्रीरंगपटना के रंगनाथ मन्दिर को टीपू ने सात चांदी के कप और एक रजत कपूर-ज्वालिक पेश किया, 18 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में हैदर अली का देहावसान एवं टीपू सुल्तान का राज्यरोहन मैसूर कि एक प्रमुख घटना है टीपू सुल्तान के आगमन के साथ ही अंग्रेजों कि साम्राज्यवादी नीति पर जबरदस्त आधात पहुँचा जहाँ एक ओर कम्पनी सरकार अपने नवजात ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए प्रयत्नशील थी तो दूसरी ओर टीपू अपनी वीरता एवं कुटनीतिज्ञता के बल पर मैसूर कि सुरक्षा के लिए दढ़ प्रतिज्ञा था.  वस्तुत  18 वी शताब्दी के उत्तरार्ध में टीपू एक ऐसा महान शासक था जिसने अंग्रेजों को भारत से निकालने का परिय्त्न किया. अपने पिता हैदर अली के पश्चात 1782 में टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठा. अपने पिता की तरह ही वह अत्याधिक महत्वांकाक्षी कुशल सेनापति और चतुर कूटनीतिज्ञ था यही कारण था कि वह हमेशा अपने पिता की पराजय का बदला अंग्रेजों से लेना चाहता था अंग्रेज उससे काफी भयभीत रहते थे. टीपू की आकृति में अंग्रेजों को नेपोलियन की तस्वीर दिखाई पड़ती थी. वह अनेक भाषाओं का ज्ञाता था अपने पिता के समय में ही उसने प्रशासनिक सैनिक तथा युद्ध विधा लेनी प्रारंभ कर दी थी परन्तु उसका सबसे बड़ा अवगुण यह था कि वह जिद्दी और घमंडी व्यक्ति था. यही दुर्गुण उसके पराजय का कारण बना वह फ्रांसिसियों पर बहुत अधिक भरोसा करता था और देशी राजाओं कि शक्तियों को तुक्ष्य समझता था वह अपने पिता के समान ही निरंकुश और स्वंत्रताचारी था लेकिन फिर भी प्रजा के तकलीफों का उसे काफी ध्यान रहता था. उसके शासन काल में किसान प्रसन्न थे वह कट्टर मुसलमान होते हुए भी धर्मान्त नहीं था वह हिन्दु, मुस्लमानों को एक नजर से देखता था बहुत बड़ा सुधारक भी था और शासन के प्रत्यक्ष क्षेत्र में सुधार लाने की चेष्टा की. उसके चरित्र के सम्बंध में विद्वानों ने काफी मतभेद है. विभिन्न अंग्रेज विद्वानों ने उसकी आलोचना करते हुए उसे अत्याचारी और धर्मान्त बताया है. इतिहास का विलक्ष के अनुसार हैदर शायद ही कोई गलती करता था और टीपू सुल्तान शायद ही कोई काम करता था मैसूर में एक कहावत है कि हैदर साम्राज्य स्थापित करने के लिए पैदा हुआ था. और टीपू उसे खोने के लिए कुछ ऐसे भी विद्वान है जिन्होंने टीपू के चरित्र की काफी प्रशंसा की है. वस्तुत: टीपू एक परिश्रमी शासक मौलिक सुधारक और महान योद्धा था. इन सारी बातों के बावजूद वह अपने पिता के समान कूटनीतिज्ञ एवं दूरदर्शी नहीं था यह उसका सबसे बड़ा अवगुण था. इससे भी बड़ी अवगुण उसकी पराजय अगर उसकी विजय होती तो उसके चरित्र की प्रशंसा की जाती. मंगलोर कि संन्धि से अंग्रेज मैसूर युद्ध का नाटक समाप्त नहीं हो पाया दोनों पक्ष इस सन्धि को चिरस्थाई नहीं मानते थे 1786 ई. में लार्ड कार्नवालिस भारत का गवर्नर जेनरल बना वह भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के मामले में सामर्थ नहीं था लेकिन उस समय कि परिस्थिति को देखते हुए उसे हस्तक्षेप करना पड़ा क्योंकि उस समय टिपु सुल्तान उसका महान शत्रु था इसलिए अंग्रेजों ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए निजाम के साथ सन्धि कर ली इस पर टिपु ने भी फ्रांसीसियो से मित्रता के लिए हाथ बढ़ाया दोनों दक्षिण में अपना प्रमुख स्थापित करना चाहता था. कार्नवालिस जानता था कि टिपु के साथ उसका युद्ध अनिवार्य है. और इसलिए महान शक्तियों के साथ वह मित्रता स्थापित करना चाहता था. उसने निजाम और मराठों के साथ सम्बन्ध कर टिपु के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा कायम किया और इसके बाद उसने टिपु के खिलाफ युद्ध कि घोषणा कर दी इस तरह तृतीय मैसुर युद्ध प्रारंभ हुआ यह युद्ध दो वर्षों तक चलता रहा प्रारंभ में अंग्रेज असफल रहे लेकिन अन्त में इसकी विजय हुई. मार्च 1782 ई. में श्री रंगापटय कि संन्धि के साथ युद्ध समाप्त हुआ टिपु ने अपने राज्य का आधा हिस्सा और 30 लाख पौड़ अंग्रेजों को दिया इसका सबसे बड़ा हिस्सा कृष्ण ता पन्द नदी के बीच का प्रदेश निजाम को मिला कुछ हिस्सा मराठों को भी प्राप्त हुआ जिससे उसकी राज्या की सीमा तंगभद्रा तक चली आई शेष हिस्सों पर अंग्रेजों का अधिकार रहा टीपु सुल्तान ने जायतन के रूप में अपने दो पुगों को भी कार्नवालिस को सुपुर्द किया इस पराजय से टीपु सुल्तान को भारी छति उठानी पड़ी उनका राज्य कम्पनी राज्य से घिर गया तथा समुद्र से उनका सम्पर्क टुट गया. आलोचकों का कहना है कि कार्नवालिस ने इस सन्धि को करने में जल्दबाजी कि और टिपु का पूर्ण निवास नहीं कर के भुल कि अगर वह टीपु की शक्ती को कुचल देता तो भविष्य में चतुर्थ मैसुर युद्ध नहीं होता लेकिन वास्तव में कार्नवालिस ने ऐसा नहीं करके अपनी दूरदर्शता का परिचय दिया था उस समय अंग्रेजी सेना में बिमारी फैली हुई थी और युरोप में इंग्लैड और फ्रांस के बीच युद्ध की समभावना थी ऐसी स्थिति में टीपु फ्रांसिसीयों कि सहायता ले सकते थे अगर सम्पूर्ण राज्य को अंग्रेज ब्रिटिश राज्य में मिला लेता तो मराठे और निजाम भी उससे जलने लगते इसलिए कार्नवालिस का उद्देश्य यह था कि टिपु की शक्ति समाप्त हो जाए और साथ ही साथ कम्पनी के मित्र भी शक्तिशाली नहीं बन सके इसलिए उन्होंने बिना अपने मित्रों को शक्तिशाली बनाये टिपु की शक्ति को कुचलने का प्रयास किया. चतुर्थ अंग्रेज मैसूर युद्ध . टीपु सुल्तान इस अपमान जनक सन्धि से काफी दुखी थे और अपनी बदनामी के कारण वह अंग्रेजो को पराजित कर दूर करना चाहता थे प्राकृति ने उन्हें ऐसा मौका भी दिया लेकिन भाग्य ने टीपु का साथ नहीं दिया इस समय इंग्लैण्ड और फ्रांस में युद्ध चल रहा था इस अन्तराष्ट्र परिस्थिति से लाभ उठाने के लिए टीपु ने विभिन्न देशों में अपना राजदुत भेजा फ्रांसिसियों को उसने अपने राज्य में विभिन्न तरह कि सुविधाएं प्रदान कि अपने सैनिक संगठन के उन्होने फरसीसी अफसर न्युक्त किये और उनहोने अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता कि अप्रैल 1798 ई. में कुछ फ्रांसीसी टीपु कि सहायता के लिए पहुँचा फलत: अंग्रेज और टीपु के बीच संघर्ष आवश्यक हो गया. इस समय लार्ड वेलेजली बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया था. उन्होनें टिपु कि शक्ति को कुचलने का निर्णय किया टीपु के विरुद्ध उसने निजाम और मराठों के साथ गठबंधन करने कि चेष्टा कि निजाम को मिलाने में वह सफल हुए लेकिन मराठों ने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया 1798 में निजाम के साथ वेलेजली ने सहायक सम्बन्ध कि और यह घोषणा कर दी जीते हुए प्रदेशों में कुछ हिस्सा मराठों को भी दिया जाय पुर्ण तैयारी के साथ वेलेजली ने मैसूर पर आक्रमण कर दिया इस तरह मैसुर का चौथा युद्ध प्रारंभ हुआ, प्रारंभ से ही टीपु सुल्तान एक पराक्रमी योध्दा थे.आखिर तक युध्द करते करते मर गये मैसूर पर अंग्रेजो कि अधिकार हो गया इस् प्रकार 33 वर्ष पुर्व मैसुर में जिस मुस्लिम शक्ति का उदय हुआ था सिर्फ उसका अन्त ही नहीं हुआ बल्कि अंग्रेज मैसुर युद्ध का नाटक ही समाप्त हो गया. मैसुर जो 33 वर्षों से लगातार अंग्रेजों कि प्रगति का दुश्मन बना था अब वह अंग्रेजों के अधिकार में आ गया था अंग्रेज और निजाम ने मिल कर मैसुर का बटवारा कर लिया कुछ हिस्सा अंग्रेजों को मिला और कुछ पर निजाम का अधिकार स्वीकार किया गया मराठों को भी उत्तर पश्चिम में कुछ प्रदेश दिये गये लेकिन उसने लेने से इनकार कर दिया बचा हुआ मैसुर राज्य मैसुर के पुराने हिन्दु राजवंश के एक नाबालिक लड़के को दे दिया गया और उसके साथ अंग्रेजों ने एक सम्बन्ध कि इस सम्बन्ध के अनुसार मैसुर की सुरक्षा का भार अंग्रेजों पर आ गया वहाँ ब्रिटिश सेना तैनात किया गया सेना का खर्च मैसुर के राजा ने देना स्वीकार किया. इस नीति से अंग्रोजों को काफी लाभ पहुँचा मैसुर राज्य बिल्कुल छोटा पड़ गया और कट्टर दुश्मन का अन्त हो गया कम्पनी कि शक्ति में काफी वृद्धि हुई मराठों को मिला हुआ हिस्सा उसने वापस कर दिया फलत: मैसुर चारों ओर से ब्रिटिश राज्य से घिर गया इसका फायदा उन्होनें भविष्य में उठाया जिससे ब्रिटिश शक्ति के विकास में काफी सहायता मिली और एक दिन उसने सम्पूर्ण हिन्दुस्तान पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया. मृत्यू 4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टना में टीपू को धोके से अंग्रेजों द्वारा क़त्ल किया गया. टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ते लड़ते शहीद हो गए. उनकी तलवार अंगरेज़ अपने साथ ब्रिटेन ले गए टीपू की मृत्यू के बाद सारा राज्य अंग्रेज़ों के हाथ आ गया.....
वाह  ताज ..

वाह ताज ..

भारत के आगरा शहर में स्थित एक विश्व धरोहर मक़बरा है. इसका निर्माण मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने, अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में करवाया था. ताजमहल मुग़ल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है. इसकी वास्तु शैली फ़ारसी, तुर्क, भारतीय और इस्लामी वास्तुकला के घटकों का अनोखा सम्मिलन है. सन् १९८३ में,  ताजमहल युनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना. इसके साथ ही इसे विश्व धरोहर के सर्वत्र प्रशंसा पाने वाली,  अत्युत्तम मानवी कृतियों में से एक बताया गया. ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया गया है, साधारणतया देखे गये संगमर्मर की सिल्लियों की बडी- बडी पर्तो से ढंक कर बनाई गई इमारतों की तरह न बनाकर इसका श्वेत गुम्बद एवं टाइल आकार में संगमर्मर से  ढंका है. केन्द्र में बना मकबरा अपनी वास्तु श्रेष्ठता में सौन्दर्य के संयोजन का परिचय देते हैं . ताजमहल इमारत समूह की संरचना की खास बात है, कि यह पूर्णतया सममितीय है. इसका निर्माण सन् १६४८ के लगभग पूर्ण हुआ था.  उस्ताद अहमद लाहौरी को प्रायः इसका प्रधान रूपांकनकर्ता माना जाता है . मक़बरा मूल – आधार  इसका मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है.यह प्रधान कक्ष घनाकार है, जिसका प्रत्येक किनारा 55 मीटर है. लम्बे किनारों पर एक भारी-भरकम पिश्ताक, या मेहराबाकार छत वाले कक्ष द्वार हैं. यह ऊपर बने मेहराब वाले छज्जे से सम्मिलित है. मुख्य मेहराब के दोनों ओर , एक के ऊपर दूसरा शैलीमें, दोनों ओर दो-दो अतिरिक्त पिश्ताक़ बने हैं.  इसी शैली में, कक्ष के चारों किनारों पर दो-दो पिश्ताक बने हैं. यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतया सममितीय है, जो कि इस इमारत को वर्ग के बजाय अष्टकोण बनाती है, परंतु कोने के चारों भुजाएं बाकी चार किनारों से काफी छोटी होने के कारण,  इसे वर्गाकार कहना ही उचित होगा. मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दूश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं. मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं. ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है.गुम्बद मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद इसका सर्वाधिक शानदार भाग है,यह प्रधान कक्ष घनाकार है, जिसका प्रत्येक किनारा 55 मीटर है. लम्बे किनारों पर एक भारी-भरकम पिश्ताक, या मेहराबाकार छत वाले कक्ष द्वार हैं. यह ऊपर बने मेहराब वाले छज्जे से सम्मिलित है. मुख्य मेहराब के दोनों ओर , एक के ऊपर दूसरा शैलीमें, दोनों ओर दो-दो अतिरिक्त पिश्ताक़ बने हैं.  इसी शैली में, कक्ष के चारों किनारों पर दो-दो पिश्ताक बने हैं. यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतया सममितीय है, जो कि इस इमारत को वर्ग के बजाय अष्टकोण बनाती है, परंतु कोने के चारों भुजाएं बाकी चार किनारों से काफी छोटी होने के कारण,  इसे वर्गाकार कहना ही उचित होगा. मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दूश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं. मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं. ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है.गुम्बद मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद इसका सर्वाधिक शानदार भाग है,इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर, 35 मीटर है और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है. यह अपने आकारानुसार प्रायः प्याज-आकार (अमरूद आकार भी कहा जाता है) का गुम्बद भी कहलाता है. इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है. यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है. मुख्य आधार के चारो कोनों पर चार विशाल मीनारें स्थित हैं. यह प्रत्येक 40 मीटर ऊँची है. यह मीनारें ताजमहल की बनावट की सममितीय प्रवृत्ति दर्शित करतीं हैं. यह मीनारें मस्जिद में अजा़न देने हेतु बनाई जाने वाली मीनारों के समान ही बनाईं गईं हैं. प्रत्येक मीनार दो-दो छज्जों द्वारा तीन समान भागों में बंटी है. मीनार के ऊपर अंतिम छज्जा है, जिस पर मुख्य इमारत के समान ही छतरी बनी हैं. इन पर वही कमलाकार आकृति एवं किरीट कलश भी हैं. इन मीनारों में एक खास बात है, यह चारों बाहर की ओर हलकी सी झुकी हुईं हैं, जिससे कि कभी गिरने की स्थिति में, यह बाहर की ओर ही गिरें, एवं मुख्य इमारत को कोई क्षति न पहुँच सके  ताजमहल का बाहरी अलंकरण, मुगल वास्तुकला का उत्कृष्टतम उदाहरण हैं. जैसे ही सतह का क्षेत्रफल बदलता है, बडे़ पिश्ताक का क्षेत्र छोटे से अधिक होता है और उसका अलंकरण भी इसी अनुपात में बदलता है. अलंकरण घटक रोगन या गचकारी से अथवा नक्काशी एवं रत्न जड़ कर निर्मित हैं. इस्लाम के मानवतारोपी आकृति के प्रतिबन्ध का पूर्ण पालन किया है. अलंकरण को केवल सुलेखन, निराकार, ज्यामितीय या पादप रूपांकन से ही किया गया है. मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दूश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं. मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं. ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है.गुम्बद मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद इसका सर्वाधिक शानदार भाग है, ताजमहल में पाई जाने वाले सुलेखन फ्लोरिड थुलुठ लिपि के हैं. ये फारसी लिपिक अमानत खां द्वारा सृजित हैं यह सुलेख जैस्प‍र को श्वेत संगमर्मर के फलकों में जड़ कर किया गया है. संगमर्मर के सेनोटैफ पर किया गया कार्य अतीव नाजु़क, कोमल एवं महीन है ऊँचाई का ध्यान रखा गया है ऊँचे फलकों पर उसी अनुपात में बडा़ लेखन किया गया है, जिससे कि नीचे से देखने पर टेढा़पन ना प्रतीत हो पूरे क्षेत्र में कु़रान की आयतें, अलंकरण हेतु प्रयोग हुईं हैं. हाल ही में हुए शोधों से ज्ञात हुआ है, कि अमानत खाँ ने ही उन आयतों का चुनाव भी किया था  अमूर्त प्रारूप प्रयुक्त किए गए हैं, खासकर आधार, मीनारों, द्वार, मस्जिद, जवाब में; और कुछ-कुछ मकबरे की सतह पर भी बलुआ-पत्थर की इमारत के गुम्बदों एवं तहखानों में, पत्थर की नक्काशी से उत्कीर्ण चित्रकारी द्वारा विस्तृत ज्यामितीय नमूने बना अमूर्त प्रारूप उकेरे गए हैं. यहां हैरिंगबोन शैली में पत्थर जड़ कर संयुक्त हुए घटकों के बीच का स्थान भरा गया है. लाल बलुआ-पत्थर इमारत में श्वेत, एवं श्वेत संगमर्मर में काले या गहरे, जडा़ऊ कार्य किए हुए हैं. संगमर्मर इमारत के गारे-चूने से बने भागों को रंगीन या गहरा रंग किया गया है. इसमें अत्यधिक जटिल ज्यामितीय प्रतिरूप बनाए गए हैं. फर्श एवं गलियारे में विरोधी रंग की टाइलों या गुटकों को टैसेलेशन नमूने में प्रयोग किया गया है. पादप रूपांकन मिलते हैं मकबरे की निचली दीवारों पर. यह श्वेत संगमर्मर के नमूने हैं, जिनमें सजीव बास रिलीफ शैली में पुष्पों एवं बेल-बूटों का सजीव अलंकरण किया गया है. संगमर्मर को खूब चिकना कर और चमका कर महीनतम ब्यौरे को भी निखारा गया है. डैडो साँचे एवं मेहराबों के स्पैन्ड्रल भी पीट्रा ड्यूरा के उच्चस्तरीय रूपांकित हैं. इन्हें लगभग ज्यामितीय बेलों, पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित किया गया है. इनमें जडे़ हुए पत्थर हैं - पीत संगमर्मर, जैस्पर, हरिताश्म, जिन्हें भीत-सतह से मिला कर घिसाई की गई है आंतरिक अलंकरण ताजमहल का आंतरिक कक्ष परंपरागत अलंकरण अवयवों से कहीं परे है.
यहाँ जडाऊ कार्य पर्चिनकारी नहीं है, वरन बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की लैपिडरी कला है. आंतरिक कक्ष एक अष्टकोण है, जिसके प्रत्येक फलक में प्रवेश-द्वार है, हांलाकि केवल दक्षिण बाग की ओर का प्रवेशद्वार ही प्रयोग होता है, आंतरिक दीवारें लगभग 25 मीटर ऊँची हैं, एवं एक आभासी आंतरिक गुम्बद से ढंकी हैं, जो कि सूर्य के चिन्ह से सजा है. आठ पिश्ताक मेहराब फर्श के स्थान को भूषित करते हैं. बाहरी ओर, प्रत्येक निचले पिश्ताक पर एक दूसरा पिश्ताक लगभग दीवार के मध्य तक जाता है. चार केन्द्रीय ऊपरी मेहराब छज्जा बनाते हैं, एवं हरेक छज्जे की बाहरी खिड़की, एक संगमर्मर की जाली से ढंकी है. छज्जों की खिड़कियों के अलावा, छत पर बनीं छतरियों से ढंके खुले छिद्रों से भी प्रकाश आता है. कक्ष की प्रत्येक दीवार डैडो बास रिलीफ, लैपिडरी एवं परिष्कृत सुलेखन फलकों से सुसज्जित है, जो कि इमारत के बाहरी नमूनों को बारीकी से दिखाती है. आठ संगमर्मर के फलकों से बनी जालियों का अष्टकोण, कब्रों को घेरे हुए है. हरेक फलक की जाली पच्चीकारी के महीन कार्य से गठित है. शेष सतह पर बहुमूल्र पत्थरों एवं रत्नों का अति महीन जडाऊ पच्चीकारी कार्य है, जो कि जोडे. में बेलें, फल एवं फूलों से सज्जित है. मुस्लिम परंपरा के अनुसार कब्र की वि
शाहजहाँ एवं मुमताज महल की कब्रें
जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर - ताजमहल का प्रथम यूरोपीय पर्यटक
स्तृत सज्जा मना है.
एक कलाकार की कल्पना अनुसार ताजमहल का हवाई चित्र
. इसलिये शाहजहाँ एवं मुमताज महल के पार्थिव शरीर इसके नीचे तुलनात्मक रूप से साधारण, असली कब्रों में, में दफ्न हैं, जिनके मुख दांए एवं मक्का की ओर हैं. मुमताज महल की कब्र आंतरिक कक्ष के मध्य में स्थित है , जिसका आयताकार संगमर्मर आधार 1.5 मीटर चौडा एवं 2.5 मीटर लम्बा है. आधार एवं ऊपर का शृंगारदान रूप, दोनों ही बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों से जडे. हैं. इस पर किया गया सुलेखन मुमताज की पहचान एवं प्रशंसा में है. इसके ढक्कन पर एक उठा हुआ आयताकार लोज़ैन्ज (र्होम्बस) बना है, जो कि एक लेखन पट्ट का आभास है. शाहजहाँ की कब्र मुमताज की कब्र के दक्षिण ओर है. यह पूरे क्षेत्र में, एकमात्र दूश्य असम्मितीय घटक है. यह असम्मिती शायद इसलिये है, कि शाहजहाँ की कब्र यहाँ बननी निर्धारित नहीं थी. यह मकबरा मुमताज के लिये मात्र बना था. यह कब्र मुमताज की कब्र से बडी है, परंतु वही घटक दर्शाती है: एक वृहततर आधार, जिस पर बना कुछ बडा श्रंगारदान, वही लैपिडरी एवं सुलेखन, जो कि उनकी पहचान देता है. तहखाने में बनी मुमताज महल की असली कब्र पर अल्लाह के निन्यानवे नाम खुदे हैं जिनमें से कुछ हैं "ओ नीतिवान, ओ भव्य, ओ राजसी, ओ अनुपम, ओ अपूर्व, ओ अनन्त, ओ अनन्त, ओ तेजस्वी... " आदि. शाहजहां की कब्र पर खुदा है. चार बाग इस कॉम्प्लेक्स को घेरे है विशाल 300 वर्ग मीटर का चारबाग, एक मुगल बाग इस बाग में ऊँचा उठा पथ है. यह पथ इस चार बाग को 16 निम्न स्तर पर बनी क्यारियों में बांटता है. बाग के मध्य में एक उच्चतल पर बने तालाब में ताजमहल का प्रतिबिम्ब दूश्य होता है. यह मकबरे एवं मुख्यद्वार के मध्य में बना है. यह प्रतिबिम्ब इसकी सुंदरता को चार चाँद लगाता है. अन्य स्थानों पर बाग में पेडो़ की कतारें हैं एवं मुख्य द्वार से मकबरे पर्यंत फौव्वारे हैं.  इस उच्च तल के तालाब को अल हौद अल कवथार कहते हैं, चारबाग के बगीचे फारसी बागों से प्रेरित हैं, तथा भारत में प्रथम दृष्ट्या मुगल बादशाह बाबर द्वारा बनवाए गए थे. यह शब्द फारसी शब्द पारिदाइजा़ से बना शब्द है, जिसका अर्थ है एक भीत्त रक्षित बाग. फारसी रहस्यवाद में मुगल कालीन इस्लामी पाठ्य में फिरदौस को एक आदर्श पूर्णता का बाग बताया गया है. इसमें कि एक केन्द्रीय पर्वत या स्रोत या फव्वारे से चार नदियाँ चारों दिशाओं, उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम की ओर बहतीं हैं, जो बाग को चार भागों में बांटतीं हैं .
चारबाग के उद्यानों का 360° विशालदर्शी दृश्य
अधिकतर मुगल चारबाग आयताकार होते हैं, जिनके केन्द्र में एक मण्डप/मकबरा बना होता है. केवल ताजमहल के बागों में यह असामान्यता है; कि मुख्य घटक मण्डप, बाग के अंत में स्थित है. यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित माहताब बाग या चांदनी बाग की खोज से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि यमुना नदी भी इस बाग के रूप का हिस्सा थी बाग के खाके एवं उसके वास्तु लक्षण्, जैसे कि फव्वारे, ईंटें, संगमर्मर के पैदल पथ एवं ज्यामितीय ईंट-जडि़त क्यारियाँ, जो काश्मीर के शालीमार बाग से एकरूप हैं, जताते हैं कि इन दोनों का ही वास्तुकार एक ही हो सकता है, अली मर्दान बाग के आरम्भिक विवरण इसके पेड़-पौधों में, गुलाब, कुमुद या नरगिस एवं फलों के वृक्षों के आधिक्य बताते हैं. जैसे जैसे मुगल साम्राज्य का पतन हुआ, बागों की देखे रेखे में कमी आई. जब ब्रिटिश राज्य में इसका प्रबन्धन आया, तो उन्होंने इसके बागों को लंडन के बगीचों की भांति बदल दिया . साथी इमारतें  ताजमहल इमारत समूह रक्षा दीवारों से परिबद्ध है. यह दीवारें तीन ओर लाल बलुआ पत्थर से बनीं हैं, एवं नदी की ओर खुला है। इन दीवारों के बाहर अतिरिक्त मकबरे स्थित हैं, जिसमें शाहजहाँ की अन्य पत्नियाँ दफ्न हैंएवं एक बडा़ मकबरा मुमताज की प्रिय दासी हेतु भी बना है। यह इमारतें भी अधिकतर लाल बलुआ पत्थर से ही निर्मित हैँ, एवं उस काल के छोटे मकबरों को दर्शातीं हैं. इन दीवारों की बागों से लगी अंदरूनी ओर में स्तंभ सहित तोरण वाले गलियारे हैं. दीवार में बीच-बीच में गुम्बद वाली गुमटियाँ भी हैं (छतरियों वाली छोटी इमारतें, जो कि तब पहरा देने के काम आती होंगीं, परंतु अब संग्रहालय बनीं हुईं हैं.मुख्य द्वार (दरवाज़ा) भी एक स्मारक स्वरूप है. यह भी संगमर्मर एवं लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है. यह आरम्भिक मुगल बादशाहों के वास्तुकला का स्मारक है. इसका मेहराब ताजमहल के मेहराब की प्रति है. इसके पिश्ताक मेहराबों पर सुलेखन से अलंकरण किया गया है.इसमें बास रिलीफ एवं पीट्रा ड्यूरा पच्चीकारी से पुष्पाकृति आदि प्रयुक्त हैं. मेहराबी छत एवं दीवारों पर यहाँ की अन्य इमारतों जैसे ज्यामितीय नमूने बनाए गए हैं. इस समूह के सुदूर छोर पर दो विशाल लाल बलुआ पत्थर की इमारतें हैं, जो कि मकबरे की ओर सामना किए हुए हैं. इनके पिछवाडे़ पूर्वी एवं पश्चिमी दीवारों से जुडे़ हैं, एवं दोनों ही एक दूसरे की प्रतिबिम्ब आकृति हैं. पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है, एवं पूर्वी को जवाब कहते हैं, जिसका प्राथमिक उद्देश्य वास्तु संतुलन है, एवं आगन्तुक कक्ष की तरह प्रयुक्त होती रही है. इन दोनों इमारतों के बीच अंतर यह है, कि मस्जिद में एक मेहराब कम है, उसमें मक्का की ओर आला बना है, एवं जवाब के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं, जबकि मस्जिद के फर्श में 569 नमाज़ पढ़ने हेतु बिछौने (जा-नमाज़) के प्रतिरूप काले संगमर्मर से बने हैं. मस्जिद का मूल रूप शाहजहाँ द्वारा निर्मित अन्य मस्जिदों के समान ही है, खासकर मस्जिद जहाँनुमा, या दिल्ली की जामा मस्जिद; एक बडा़ दालान या कक्ष या प्रांगण, जिस पर तीन गुम्बद बने हैं. इस काल की मुगल मस्जिदें, पुण्यस्थान को तीन भागों में बांटतीं हैं; बीचों बीच मुख्य स्थान, एवं दोनो ओर छोटे स्थान. ताजमहल में हरेक पुण्यस्थान एक वृहत मेहराबी तहखाने में खुलता है. यह साथी इमारतें 1643 में पुरी हुईं. निर्माण  ताजमहल परिसीमित  आगरा नगर के दक्षिण छोर पर एक छोटे भूमि पठार पर बनाया गया था. शाहजहाँ ने इसके बदले जयपुर के महाराजा जयसिंह को आगरा शहर के मध्य एक वृहत महल दिया था.  लगभग तीन एकड़ के क्षेत्र को खोदा गया, एवं उसमें कूडा़ कर्कट भर कर उसे नदी सतह से पचास मीटर ऊँचा बनाया गया, जिससे कि सीलन आदि से बचाव हो पाए. मकबरे के क्षेत्र में, पचास कुँए खोद कर कंकड़-पत्थरों से भरकर नींव स्थान बनाया गया. फिर बांस के परंपरागत पैड़ (स्कैफ्फोल्डिंग) के बजाय, एक बहुत बडा़ ईंटों का, मकबरे समान ही ढाँचा बनाया गया. यह ढाँचा इतना बडा़ था, कि अभियाँत्रिकों के अनुमान से उसे हटाने में ही सालों लग जाते. इसका समाधान यह हुआ, कि शाहजाहाँ के आदेशानुसार स्थानीय किसानों को खुली छूट दी गई कि एक दिन में कोई भी चाहे जितनी ईंटें उठा सकता है और वह ढाँचा रात भर में ही साफ हो गया. सारी निर्माण सामग्री एवं संगमर्मर को नियत स्थान पर पहुँचाने हेतु, एक पंद्रह किलोमीटर लम्बा मिट्टी का ढाल बनाया गया बीस से तीस बैलों को खास निर्मित गाडि़यों में जोतकर शिलाखण्डों को यहाँ लाया गया था. एक विस्तृत पैड़ एवं बल्ली से बनी, चरखी चलाने की प्रणाली बनाई गई, जिससे कि खण्डों को इच्छित स्थानों पर पहुँचाया गया. नदी से पानी लाने हेतु रहट प्रणाली का प्रयोग किया गया था. उससे पानी ऊपर बने बडे़ टैंक में भरा जाता था फिर यह तीन गौण टैंकों में भरा जाता था, जहाँ से यह नलियों (पाइपों) द्वारा स्थानों पर पहुँचाया जाता था. आधारशिला एवं मकबरे को निर्मित होने में बारह साल लगे. शेष इमारतों एवं भागों को अगले दस वर्षों में पूर्ण किया गया. इनमें पहले मीनारें, फिर मस्जिद, फिर जवाब एवं अंत में मुख्य द्वार बने. क्योंकि यह समूह, कई अवस्थाओं में बना,  इसलिये इसकी निर्माण-समाप्ति तिथि में कई भिन्नताएं हैं. यह इसलिये है, क्योंकि पूर्णता के कई पृथक मत हैं. मुख्य मकबरा 1643 में पूर्ण हुआ था, किंतु शेष समूह इमारतें बनती रहीं. इसी प्रकार इसकी निर्माण कीमत में भी भिन्नताएं हैं, क्योंकि इसकी कीमत तय करने में समय के अंतराल से काफी फर्क आ गया है. फिर भी कुल मूल्य लगभग 3 अरब 20 करोड़ रुपए, उस समयानुसार आंका गया है; जो कि वर्तमान में खरबों डॉलर से भी अधिक हो सकता है, यदि वर्तमान मुद्रा में बदला जाए. ताजमहल को सम्पूर्ण भारत एवं एशिया से लाई गई सामग्री से निर्मित किया गया था. 1,000 से अधिक हाथी निर्माण के दौरान यातायात हेतु प्रयोग हुए थे. पराभासी श्वेत संगमर्मर को राजस्थान से लाया गया था, जिस पर  को पंजाब से, हरिताश्म या जेड एवं स्फटिक या क्रिस्टल को चीन से. तिब्बत से फीरोजा़, अफगानिस्तान से लैपिज़ लजू़ली, श्रीलंका से नीलम एवं अरबिया से इंद्रगोप या (कार्नेलियन) लाए गए थे. कुल मिला कर अठ्ठाइस प्रकार के बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न श्वेत संगमर्मर में जडे. गए थे. उत्तरी भारत से लगभग बीस हजा़र मज़दूरों की सेना अन्वरत कार्यरत थी. बुखारा से शिल्पकार, सीरिया एवं ईरान से सुलेखन कर्ता, दक्षिण भारत से पच्चीकारी के कारीगर, बलूचिस्तान से पत्थर तराशने एवं काटने वाले कारीगर इनमें शामिल थे. कंगूरे, बुर्जी एवं कलश आदि बनाने वाले, दूसरा जो केवल संगमर्मर पर पुष्प तराश्ता था, इत्यादि सत्ताईस कारीगरों में से कुछ थे, जिन्होंने सृजन इकाई गठित की थी. कुछ खास कारीगर, जो कि ताजमहल के निर्माण में अपना स्थान रखते हैं, वे हैं. मुख्य गुम्बद का अभिकल्पक इस्माइल (ए.का.इस्माइल खाँ) जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य का प्रमुख गोलार्ध एवं गुम्बद अभिकल्पक थे. फारस के उस्ताद ईसा एवं ईसा मुहम्मद एफेंदी (दोनों ईरान से), जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य के कोचा मिमार सिनान आगा द्वारा प्रशिक्षित किये गये थे, इनका बार बार यहाँ के मूर अभिकल्पना में उल्लेख आता है. परंतु इस दावे के पीछे बहुत कम साक्ष्य हैं. बेनारुस, फारस (ईरान) से 'पुरु' को पर्यवेक्षण वास्तुकार नियुक्त किया गया. का़जि़म खान, लाहौर का निवासी, ने ठोस सुवर्ण कलश निर्मित किया. चिरंजी लाल, दिल्ली का एक लैपिडरी, प्रधान शिलपी, एवं पच्चीकारक घोषित किया गया था. अमानत खाँ, जो कि शिराज़, ईरान से था, मुख्य सुलेखना कर्त्ता था. उसका नाम मुख्य द्वार के सुलेखन के अंत में खुदा है .मुहम्मद हनीफ, राज मिस्त्रियों का पर्यवेक्षक था,  साथ ही मीर अब्दुल करीम एवं मुकर्‍इमत खां, शिराज़, ईरान से  इनके हाथिओं में प्रतिदिन का वित्त एवं प्रबंधन था. इतिहास  ताजमहल के पूरा होने के तुरंत बाद ही, शाहजहाँ को अपने पुत्र औरंगजे़ब द्वारा अपदस्थ कर, आगरा के किले में नज़रबन्द कर दिया गया. शाहजहाँ की मृत्यु के बाद, उसे उसकी पत्नी के बराबर में दफना दिया गया था.