चारबाग के उद्यानों का 360° विशालदर्शी दृश्य
अधिकतर मुगल चारबाग
आयताकार होते हैं, जिनके केन्द्र में एक
मण्डप/मकबरा बना होता है. केवल ताजमहल के बागों में यह असामान्यता है; कि मुख्य घटक मण्डप, बाग के अंत में स्थित है.
यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित माहताब बाग या चांदनी बाग की खोज से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि यमुना नदी भी इस बाग के रूप का हिस्सा थी बाग के खाके एवं उसके वास्तु
लक्षण्, जैसे कि फव्वारे, ईंटें, संगमर्मर के पैदल पथ एवं ज्यामितीय ईंट-जडि़त क्यारियाँ, जो काश्मीर के शालीमार बाग से एकरूप हैं, जताते हैं कि इन दोनों का
ही वास्तुकार एक ही हो सकता है, अली मर्दान बाग के
आरम्भिक विवरण इसके पेड़-पौधों में, गुलाब, कुमुद या नरगिस एवं फलों के वृक्षों के आधिक्य बताते हैं. जैसे जैसे मुगल साम्राज्य का पतन हुआ, बागों की देखे रेखे में
कमी आई. जब ब्रिटिश राज्य में इसका प्रबन्धन आया, तो उन्होंने इसके बागों को लंडन के बगीचों की भांति बदल दिया . साथी इमारतें ताजमहल इमारत समूह रक्षा
दीवारों से परिबद्ध है. यह दीवारें तीन ओर लाल बलुआ पत्थर से बनीं हैं, एवं नदी की ओर खुला है। इन दीवारों के बाहर अतिरिक्त मकबरे स्थित हैं, जिसमें शाहजहाँ की अन्य पत्नियाँ दफ्न हैं, एवं एक बडा़ मकबरा मुमताज
की प्रिय दासी हेतु भी बना है। यह इमारतें भी अधिकतर लाल बलुआ पत्थर से ही निर्मित
हैँ, एवं उस काल के छोटे मकबरों को दर्शातीं हैं. इन दीवारों की बागों से लगी
अंदरूनी ओर में स्तंभ सहित तोरण वाले गलियारे हैं. दीवार में बीच-बीच में गुम्बद
वाली गुमटियाँ भी हैं (छतरियों वाली छोटी इमारतें, जो कि तब पहरा देने के काम आती होंगीं, परंतु अब संग्रहालय बनीं
हुईं हैं.मुख्य द्वार (दरवाज़ा) भी एक स्मारक स्वरूप है. यह भी संगमर्मर एवं लाल
बलुआ पत्थर से निर्मित है. यह आरम्भिक मुगल बादशाहों के वास्तुकला का स्मारक है.
इसका मेहराब ताजमहल के मेहराब की प्रति है. इसके पिश्ताक मेहराबों पर सुलेखन से
अलंकरण किया गया है.इसमें बास रिलीफ एवं
पीट्रा ड्यूरा पच्चीकारी से पुष्पाकृति आदि प्रयुक्त हैं. मेहराबी छत एवं दीवारों
पर यहाँ की अन्य इमारतों जैसे ज्यामितीय नमूने बनाए गए हैं. इस समूह के सुदूर छोर पर दो विशाल लाल बलुआ पत्थर की इमारतें हैं, जो कि मकबरे की ओर सामना किए हुए हैं. इनके पिछवाडे़ पूर्वी एवं पश्चिमी
दीवारों से जुडे़ हैं, एवं दोनों ही एक दूसरे की
प्रतिबिम्ब आकृति हैं. पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है, एवं पूर्वी को जवाब कहते हैं, जिसका प्राथमिक उद्देश्य
वास्तु संतुलन है, एवं आगन्तुक कक्ष की तरह
प्रयुक्त होती रही है. इन दोनों इमारतों के बीच अंतर यह है, कि मस्जिद में एक मेहराब कम है, उसमें मक्का की ओर आला
बना है, एवं जवाब के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं, जबकि मस्जिद के फर्श में 569 नमाज़ पढ़ने हेतु बिछौने
(जा-नमाज़) के प्रतिरूप काले संगमर्मर से बने हैं. मस्जिद का मूल रूप शाहजहाँ
द्वारा निर्मित अन्य मस्जिदों के समान ही है, खासकर मस्जिद जहाँनुमा, या दिल्ली की जामा मस्जिद; एक बडा़ दालान या कक्ष या
प्रांगण, जिस पर तीन गुम्बद बने हैं. इस काल की मुगल मस्जिदें, पुण्यस्थान को तीन भागों में बांटतीं हैं; बीचों बीच मुख्य स्थान, एवं दोनो ओर छोटे स्थान. ताजमहल में हरेक पुण्यस्थान एक वृहत मेहराबी तहखाने
में खुलता है. यह साथी इमारतें 1643 में पुरी हुईं. निर्माण ताजमहल परिसीमित आगरा नगर के दक्षिण छोर
पर एक छोटे भूमि पठार पर बनाया गया था. शाहजहाँ ने इसके बदले जयपुर के महाराजा
जयसिंह को आगरा शहर के मध्य एक वृहत महल दिया था. लगभग तीन एकड़ के क्षेत्र
को खोदा गया, एवं उसमें कूडा़ कर्कट भर
कर उसे नदी सतह से पचास मीटर ऊँचा बनाया गया, जिससे कि सीलन आदि से
बचाव हो पाए. मकबरे के क्षेत्र में, पचास कुँए खोद कर
कंकड़-पत्थरों से भरकर नींव स्थान बनाया गया. फिर बांस के परंपरागत पैड़
(स्कैफ्फोल्डिंग) के बजाय, एक बहुत बडा़ ईंटों का, मकबरे समान ही ढाँचा बनाया गया. यह ढाँचा इतना बडा़ था, कि अभियाँत्रिकों के अनुमान से उसे हटाने में ही सालों लग जाते. इसका समाधान
यह हुआ, कि शाहजाहाँ के आदेशानुसार स्थानीय किसानों को खुली छूट दी गई कि एक दिन में
कोई भी चाहे जितनी ईंटें उठा सकता है और वह ढाँचा रात भर में ही साफ हो गया. सारी
निर्माण सामग्री एवं संगमर्मर को नियत स्थान पर पहुँचाने हेतु, एक पंद्रह किलोमीटर लम्बा मिट्टी का ढाल बनाया गया बीस से तीस बैलों को खास
निर्मित गाडि़यों में जोतकर शिलाखण्डों को यहाँ लाया गया था. एक विस्तृत पैड़ एवं
बल्ली से बनी, चरखी चलाने की प्रणाली
बनाई गई, जिससे कि खण्डों को इच्छित स्थानों पर पहुँचाया गया. नदी से पानी लाने हेतु रहट
प्रणाली का प्रयोग किया गया था. उससे पानी ऊपर बने बडे़ टैंक में भरा जाता था फिर
यह तीन गौण टैंकों में भरा जाता था, जहाँ से यह नलियों
(पाइपों) द्वारा स्थानों पर पहुँचाया जाता था. आधारशिला एवं मकबरे को निर्मित होने में बारह साल लगे.
शेष इमारतों एवं भागों को अगले दस वर्षों में पूर्ण किया गया. इनमें पहले मीनारें, फिर मस्जिद, फिर जवाब एवं अंत में
मुख्य द्वार बने. क्योंकि यह समूह, कई अवस्थाओं में बना, इसलिये इसकी निर्माण-समाप्ति तिथि में
कई भिन्नताएं हैं. यह इसलिये है, क्योंकि पूर्णता के कई
पृथक मत हैं. मुख्य मकबरा 1643 में पूर्ण हुआ था, किंतु शेष समूह इमारतें
बनती रहीं. इसी प्रकार इसकी निर्माण कीमत में भी भिन्नताएं हैं, क्योंकि इसकी कीमत तय करने में समय के अंतराल से काफी फर्क आ गया है. फिर भी
कुल मूल्य लगभग 3 अरब 20 करोड़ रुपए, उस समयानुसार आंका गया है; जो कि वर्तमान में खरबों डॉलर से भी अधिक हो सकता है, यदि वर्तमान मुद्रा में बदला जाए. ताजमहल को सम्पूर्ण भारत एवं एशिया से लाई गई सामग्री से निर्मित किया गया था.
1,000
से अधिक हाथी निर्माण के दौरान यातायात हेतु प्रयोग
हुए थे. पराभासी श्वेत संगमर्मर को राजस्थान से लाया गया था, जिस पर को पंजाब से, हरिताश्म या जेड एवं स्फटिक या क्रिस्टल को चीन से. तिब्बत से फीरोजा़, अफगानिस्तान से लैपिज़ लजू़ली, श्रीलंका से नीलम एवं
अरबिया से इंद्रगोप या (कार्नेलियन) लाए गए थे. कुल मिला कर अठ्ठाइस प्रकार के
बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न श्वेत संगमर्मर में जडे. गए थे. उत्तरी भारत से लगभग बीस
हजा़र मज़दूरों की सेना अन्वरत कार्यरत थी. बुखारा से शिल्पकार, सीरिया एवं ईरान से सुलेखन कर्ता, दक्षिण भारत से पच्चीकारी
के कारीगर, बलूचिस्तान से पत्थर
तराशने एवं काटने वाले कारीगर इनमें शामिल थे. कंगूरे, बुर्जी एवं कलश आदि बनाने वाले, दूसरा जो केवल संगमर्मर
पर पुष्प तराश्ता था, इत्यादि सत्ताईस कारीगरों
में से कुछ थे, जिन्होंने सृजन इकाई गठित
की थी. कुछ खास कारीगर, जो कि ताजमहल के निर्माण
में अपना स्थान रखते हैं, वे हैं. मुख्य गुम्बद का
अभिकल्पक इस्माइल (ए.का.इस्माइल खाँ) जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य का प्रमुख गोलार्ध
एवं गुम्बद अभिकल्पक थे. फारस के उस्ताद ईसा एवं ईसा मुहम्मद एफेंदी (दोनों ईरान
से), जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य के कोचा मिमार सिनान आगा द्वारा प्रशिक्षित किये गये
थे, इनका बार बार यहाँ के मूर अभिकल्पना में उल्लेख आता है. परंतु इस दावे के पीछे
बहुत कम साक्ष्य हैं. बेनारुस, फारस (ईरान) से 'पुरु' को पर्यवेक्षण वास्तुकार नियुक्त किया गया. का़जि़म खान, लाहौर का निवासी, ने ठोस सुवर्ण कलश
निर्मित किया. चिरंजी लाल, दिल्ली का एक लैपिडरी, प्रधान शिलपी, एवं पच्चीकारक घोषित किया
गया था. अमानत खाँ, जो कि शिराज़, ईरान से था, मुख्य सुलेखना कर्त्ता था.
उसका नाम मुख्य द्वार के सुलेखन के अंत में खुदा है .मुहम्मद हनीफ, राज मिस्त्रियों का पर्यवेक्षक था, साथ ही मीर अब्दुल करीम
एवं मुकर्इमत खां, शिराज़, ईरान से इनके हाथिओं में प्रतिदिन का वित्त एवं प्रबंधन था. इतिहास ताजमहल के पूरा होने के तुरंत बाद ही, शाहजहाँ को अपने पुत्र औरंगजे़ब द्वारा अपदस्थ कर, आगरा के किले में नज़रबन्द कर दिया गया. शाहजहाँ की मृत्यु के बाद, उसे उसकी पत्नी के बराबर में दफना दिया गया था. |