वाह  ताज ..

वाह ताज ..

भारत के आगरा शहर में स्थित एक विश्व धरोहर मक़बरा है. इसका निर्माण मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने, अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में करवाया था. ताजमहल मुग़ल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है. इसकी वास्तु शैली फ़ारसी, तुर्क, भारतीय और इस्लामी वास्तुकला के घटकों का अनोखा सम्मिलन है. सन् १९८३ में,  ताजमहल युनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना. इसके साथ ही इसे विश्व धरोहर के सर्वत्र प्रशंसा पाने वाली,  अत्युत्तम मानवी कृतियों में से एक बताया गया. ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया गया है, साधारणतया देखे गये संगमर्मर की सिल्लियों की बडी- बडी पर्तो से ढंक कर बनाई गई इमारतों की तरह न बनाकर इसका श्वेत गुम्बद एवं टाइल आकार में संगमर्मर से  ढंका है. केन्द्र में बना मकबरा अपनी वास्तु श्रेष्ठता में सौन्दर्य के संयोजन का परिचय देते हैं . ताजमहल इमारत समूह की संरचना की खास बात है, कि यह पूर्णतया सममितीय है. इसका निर्माण सन् १६४८ के लगभग पूर्ण हुआ था.  उस्ताद अहमद लाहौरी को प्रायः इसका प्रधान रूपांकनकर्ता माना जाता है . मक़बरा मूल – आधार  इसका मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है.यह प्रधान कक्ष घनाकार है, जिसका प्रत्येक किनारा 55 मीटर है. लम्बे किनारों पर एक भारी-भरकम पिश्ताक, या मेहराबाकार छत वाले कक्ष द्वार हैं. यह ऊपर बने मेहराब वाले छज्जे से सम्मिलित है. मुख्य मेहराब के दोनों ओर , एक के ऊपर दूसरा शैलीमें, दोनों ओर दो-दो अतिरिक्त पिश्ताक़ बने हैं.  इसी शैली में, कक्ष के चारों किनारों पर दो-दो पिश्ताक बने हैं. यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतया सममितीय है, जो कि इस इमारत को वर्ग के बजाय अष्टकोण बनाती है, परंतु कोने के चारों भुजाएं बाकी चार किनारों से काफी छोटी होने के कारण,  इसे वर्गाकार कहना ही उचित होगा. मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दूश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं. मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं. ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है.गुम्बद मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद इसका सर्वाधिक शानदार भाग है,यह प्रधान कक्ष घनाकार है, जिसका प्रत्येक किनारा 55 मीटर है. लम्बे किनारों पर एक भारी-भरकम पिश्ताक, या मेहराबाकार छत वाले कक्ष द्वार हैं. यह ऊपर बने मेहराब वाले छज्जे से सम्मिलित है. मुख्य मेहराब के दोनों ओर , एक के ऊपर दूसरा शैलीमें, दोनों ओर दो-दो अतिरिक्त पिश्ताक़ बने हैं.  इसी शैली में, कक्ष के चारों किनारों पर दो-दो पिश्ताक बने हैं. यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतया सममितीय है, जो कि इस इमारत को वर्ग के बजाय अष्टकोण बनाती है, परंतु कोने के चारों भुजाएं बाकी चार किनारों से काफी छोटी होने के कारण,  इसे वर्गाकार कहना ही उचित होगा. मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दूश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं. मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं. ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है.गुम्बद मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद इसका सर्वाधिक शानदार भाग है,इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर, 35 मीटर है और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है. यह अपने आकारानुसार प्रायः प्याज-आकार (अमरूद आकार भी कहा जाता है) का गुम्बद भी कहलाता है. इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है. यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है. मुख्य आधार के चारो कोनों पर चार विशाल मीनारें स्थित हैं. यह प्रत्येक 40 मीटर ऊँची है. यह मीनारें ताजमहल की बनावट की सममितीय प्रवृत्ति दर्शित करतीं हैं. यह मीनारें मस्जिद में अजा़न देने हेतु बनाई जाने वाली मीनारों के समान ही बनाईं गईं हैं. प्रत्येक मीनार दो-दो छज्जों द्वारा तीन समान भागों में बंटी है. मीनार के ऊपर अंतिम छज्जा है, जिस पर मुख्य इमारत के समान ही छतरी बनी हैं. इन पर वही कमलाकार आकृति एवं किरीट कलश भी हैं. इन मीनारों में एक खास बात है, यह चारों बाहर की ओर हलकी सी झुकी हुईं हैं, जिससे कि कभी गिरने की स्थिति में, यह बाहर की ओर ही गिरें, एवं मुख्य इमारत को कोई क्षति न पहुँच सके  ताजमहल का बाहरी अलंकरण, मुगल वास्तुकला का उत्कृष्टतम उदाहरण हैं. जैसे ही सतह का क्षेत्रफल बदलता है, बडे़ पिश्ताक का क्षेत्र छोटे से अधिक होता है और उसका अलंकरण भी इसी अनुपात में बदलता है. अलंकरण घटक रोगन या गचकारी से अथवा नक्काशी एवं रत्न जड़ कर निर्मित हैं. इस्लाम के मानवतारोपी आकृति के प्रतिबन्ध का पूर्ण पालन किया है. अलंकरण को केवल सुलेखन, निराकार, ज्यामितीय या पादप रूपांकन से ही किया गया है. मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दूश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं. मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं. ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है.गुम्बद मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद इसका सर्वाधिक शानदार भाग है, ताजमहल में पाई जाने वाले सुलेखन फ्लोरिड थुलुठ लिपि के हैं. ये फारसी लिपिक अमानत खां द्वारा सृजित हैं यह सुलेख जैस्प‍र को श्वेत संगमर्मर के फलकों में जड़ कर किया गया है. संगमर्मर के सेनोटैफ पर किया गया कार्य अतीव नाजु़क, कोमल एवं महीन है ऊँचाई का ध्यान रखा गया है ऊँचे फलकों पर उसी अनुपात में बडा़ लेखन किया गया है, जिससे कि नीचे से देखने पर टेढा़पन ना प्रतीत हो पूरे क्षेत्र में कु़रान की आयतें, अलंकरण हेतु प्रयोग हुईं हैं. हाल ही में हुए शोधों से ज्ञात हुआ है, कि अमानत खाँ ने ही उन आयतों का चुनाव भी किया था  अमूर्त प्रारूप प्रयुक्त किए गए हैं, खासकर आधार, मीनारों, द्वार, मस्जिद, जवाब में; और कुछ-कुछ मकबरे की सतह पर भी बलुआ-पत्थर की इमारत के गुम्बदों एवं तहखानों में, पत्थर की नक्काशी से उत्कीर्ण चित्रकारी द्वारा विस्तृत ज्यामितीय नमूने बना अमूर्त प्रारूप उकेरे गए हैं. यहां हैरिंगबोन शैली में पत्थर जड़ कर संयुक्त हुए घटकों के बीच का स्थान भरा गया है. लाल बलुआ-पत्थर इमारत में श्वेत, एवं श्वेत संगमर्मर में काले या गहरे, जडा़ऊ कार्य किए हुए हैं. संगमर्मर इमारत के गारे-चूने से बने भागों को रंगीन या गहरा रंग किया गया है. इसमें अत्यधिक जटिल ज्यामितीय प्रतिरूप बनाए गए हैं. फर्श एवं गलियारे में विरोधी रंग की टाइलों या गुटकों को टैसेलेशन नमूने में प्रयोग किया गया है. पादप रूपांकन मिलते हैं मकबरे की निचली दीवारों पर. यह श्वेत संगमर्मर के नमूने हैं, जिनमें सजीव बास रिलीफ शैली में पुष्पों एवं बेल-बूटों का सजीव अलंकरण किया गया है. संगमर्मर को खूब चिकना कर और चमका कर महीनतम ब्यौरे को भी निखारा गया है. डैडो साँचे एवं मेहराबों के स्पैन्ड्रल भी पीट्रा ड्यूरा के उच्चस्तरीय रूपांकित हैं. इन्हें लगभग ज्यामितीय बेलों, पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित किया गया है. इनमें जडे़ हुए पत्थर हैं - पीत संगमर्मर, जैस्पर, हरिताश्म, जिन्हें भीत-सतह से मिला कर घिसाई की गई है आंतरिक अलंकरण ताजमहल का आंतरिक कक्ष परंपरागत अलंकरण अवयवों से कहीं परे है.
यहाँ जडाऊ कार्य पर्चिनकारी नहीं है, वरन बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की लैपिडरी कला है. आंतरिक कक्ष एक अष्टकोण है, जिसके प्रत्येक फलक में प्रवेश-द्वार है, हांलाकि केवल दक्षिण बाग की ओर का प्रवेशद्वार ही प्रयोग होता है, आंतरिक दीवारें लगभग 25 मीटर ऊँची हैं, एवं एक आभासी आंतरिक गुम्बद से ढंकी हैं, जो कि सूर्य के चिन्ह से सजा है. आठ पिश्ताक मेहराब फर्श के स्थान को भूषित करते हैं. बाहरी ओर, प्रत्येक निचले पिश्ताक पर एक दूसरा पिश्ताक लगभग दीवार के मध्य तक जाता है. चार केन्द्रीय ऊपरी मेहराब छज्जा बनाते हैं, एवं हरेक छज्जे की बाहरी खिड़की, एक संगमर्मर की जाली से ढंकी है. छज्जों की खिड़कियों के अलावा, छत पर बनीं छतरियों से ढंके खुले छिद्रों से भी प्रकाश आता है. कक्ष की प्रत्येक दीवार डैडो बास रिलीफ, लैपिडरी एवं परिष्कृत सुलेखन फलकों से सुसज्जित है, जो कि इमारत के बाहरी नमूनों को बारीकी से दिखाती है. आठ संगमर्मर के फलकों से बनी जालियों का अष्टकोण, कब्रों को घेरे हुए है. हरेक फलक की जाली पच्चीकारी के महीन कार्य से गठित है. शेष सतह पर बहुमूल्र पत्थरों एवं रत्नों का अति महीन जडाऊ पच्चीकारी कार्य है, जो कि जोडे. में बेलें, फल एवं फूलों से सज्जित है. मुस्लिम परंपरा के अनुसार कब्र की वि
शाहजहाँ एवं मुमताज महल की कब्रें
जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर - ताजमहल का प्रथम यूरोपीय पर्यटक
स्तृत सज्जा मना है.
एक कलाकार की कल्पना अनुसार ताजमहल का हवाई चित्र
. इसलिये शाहजहाँ एवं मुमताज महल के पार्थिव शरीर इसके नीचे तुलनात्मक रूप से साधारण, असली कब्रों में, में दफ्न हैं, जिनके मुख दांए एवं मक्का की ओर हैं. मुमताज महल की कब्र आंतरिक कक्ष के मध्य में स्थित है , जिसका आयताकार संगमर्मर आधार 1.5 मीटर चौडा एवं 2.5 मीटर लम्बा है. आधार एवं ऊपर का शृंगारदान रूप, दोनों ही बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों से जडे. हैं. इस पर किया गया सुलेखन मुमताज की पहचान एवं प्रशंसा में है. इसके ढक्कन पर एक उठा हुआ आयताकार लोज़ैन्ज (र्होम्बस) बना है, जो कि एक लेखन पट्ट का आभास है. शाहजहाँ की कब्र मुमताज की कब्र के दक्षिण ओर है. यह पूरे क्षेत्र में, एकमात्र दूश्य असम्मितीय घटक है. यह असम्मिती शायद इसलिये है, कि शाहजहाँ की कब्र यहाँ बननी निर्धारित नहीं थी. यह मकबरा मुमताज के लिये मात्र बना था. यह कब्र मुमताज की कब्र से बडी है, परंतु वही घटक दर्शाती है: एक वृहततर आधार, जिस पर बना कुछ बडा श्रंगारदान, वही लैपिडरी एवं सुलेखन, जो कि उनकी पहचान देता है. तहखाने में बनी मुमताज महल की असली कब्र पर अल्लाह के निन्यानवे नाम खुदे हैं जिनमें से कुछ हैं "ओ नीतिवान, ओ भव्य, ओ राजसी, ओ अनुपम, ओ अपूर्व, ओ अनन्त, ओ अनन्त, ओ तेजस्वी... " आदि. शाहजहां की कब्र पर खुदा है. चार बाग इस कॉम्प्लेक्स को घेरे है विशाल 300 वर्ग मीटर का चारबाग, एक मुगल बाग इस बाग में ऊँचा उठा पथ है. यह पथ इस चार बाग को 16 निम्न स्तर पर बनी क्यारियों में बांटता है. बाग के मध्य में एक उच्चतल पर बने तालाब में ताजमहल का प्रतिबिम्ब दूश्य होता है. यह मकबरे एवं मुख्यद्वार के मध्य में बना है. यह प्रतिबिम्ब इसकी सुंदरता को चार चाँद लगाता है. अन्य स्थानों पर बाग में पेडो़ की कतारें हैं एवं मुख्य द्वार से मकबरे पर्यंत फौव्वारे हैं.  इस उच्च तल के तालाब को अल हौद अल कवथार कहते हैं, चारबाग के बगीचे फारसी बागों से प्रेरित हैं, तथा भारत में प्रथम दृष्ट्या मुगल बादशाह बाबर द्वारा बनवाए गए थे. यह शब्द फारसी शब्द पारिदाइजा़ से बना शब्द है, जिसका अर्थ है एक भीत्त रक्षित बाग. फारसी रहस्यवाद में मुगल कालीन इस्लामी पाठ्य में फिरदौस को एक आदर्श पूर्णता का बाग बताया गया है. इसमें कि एक केन्द्रीय पर्वत या स्रोत या फव्वारे से चार नदियाँ चारों दिशाओं, उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम की ओर बहतीं हैं, जो बाग को चार भागों में बांटतीं हैं .
चारबाग के उद्यानों का 360° विशालदर्शी दृश्य
अधिकतर मुगल चारबाग आयताकार होते हैं, जिनके केन्द्र में एक मण्डप/मकबरा बना होता है. केवल ताजमहल के बागों में यह असामान्यता है; कि मुख्य घटक मण्डप, बाग के अंत में स्थित है. यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित माहताब बाग या चांदनी बाग की खोज से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि यमुना नदी भी इस बाग के रूप का हिस्सा थी बाग के खाके एवं उसके वास्तु लक्षण्, जैसे कि फव्वारे, ईंटें, संगमर्मर के पैदल पथ एवं ज्यामितीय ईंट-जडि़त क्यारियाँ, जो काश्मीर के शालीमार बाग से एकरूप हैं, जताते हैं कि इन दोनों का ही वास्तुकार एक ही हो सकता है, अली मर्दान बाग के आरम्भिक विवरण इसके पेड़-पौधों में, गुलाब, कुमुद या नरगिस एवं फलों के वृक्षों के आधिक्य बताते हैं. जैसे जैसे मुगल साम्राज्य का पतन हुआ, बागों की देखे रेखे में कमी आई. जब ब्रिटिश राज्य में इसका प्रबन्धन आया, तो उन्होंने इसके बागों को लंडन के बगीचों की भांति बदल दिया . साथी इमारतें  ताजमहल इमारत समूह रक्षा दीवारों से परिबद्ध है. यह दीवारें तीन ओर लाल बलुआ पत्थर से बनीं हैं, एवं नदी की ओर खुला है। इन दीवारों के बाहर अतिरिक्त मकबरे स्थित हैं, जिसमें शाहजहाँ की अन्य पत्नियाँ दफ्न हैंएवं एक बडा़ मकबरा मुमताज की प्रिय दासी हेतु भी बना है। यह इमारतें भी अधिकतर लाल बलुआ पत्थर से ही निर्मित हैँ, एवं उस काल के छोटे मकबरों को दर्शातीं हैं. इन दीवारों की बागों से लगी अंदरूनी ओर में स्तंभ सहित तोरण वाले गलियारे हैं. दीवार में बीच-बीच में गुम्बद वाली गुमटियाँ भी हैं (छतरियों वाली छोटी इमारतें, जो कि तब पहरा देने के काम आती होंगीं, परंतु अब संग्रहालय बनीं हुईं हैं.मुख्य द्वार (दरवाज़ा) भी एक स्मारक स्वरूप है. यह भी संगमर्मर एवं लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है. यह आरम्भिक मुगल बादशाहों के वास्तुकला का स्मारक है. इसका मेहराब ताजमहल के मेहराब की प्रति है. इसके पिश्ताक मेहराबों पर सुलेखन से अलंकरण किया गया है.इसमें बास रिलीफ एवं पीट्रा ड्यूरा पच्चीकारी से पुष्पाकृति आदि प्रयुक्त हैं. मेहराबी छत एवं दीवारों पर यहाँ की अन्य इमारतों जैसे ज्यामितीय नमूने बनाए गए हैं. इस समूह के सुदूर छोर पर दो विशाल लाल बलुआ पत्थर की इमारतें हैं, जो कि मकबरे की ओर सामना किए हुए हैं. इनके पिछवाडे़ पूर्वी एवं पश्चिमी दीवारों से जुडे़ हैं, एवं दोनों ही एक दूसरे की प्रतिबिम्ब आकृति हैं. पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है, एवं पूर्वी को जवाब कहते हैं, जिसका प्राथमिक उद्देश्य वास्तु संतुलन है, एवं आगन्तुक कक्ष की तरह प्रयुक्त होती रही है. इन दोनों इमारतों के बीच अंतर यह है, कि मस्जिद में एक मेहराब कम है, उसमें मक्का की ओर आला बना है, एवं जवाब के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं, जबकि मस्जिद के फर्श में 569 नमाज़ पढ़ने हेतु बिछौने (जा-नमाज़) के प्रतिरूप काले संगमर्मर से बने हैं. मस्जिद का मूल रूप शाहजहाँ द्वारा निर्मित अन्य मस्जिदों के समान ही है, खासकर मस्जिद जहाँनुमा, या दिल्ली की जामा मस्जिद; एक बडा़ दालान या कक्ष या प्रांगण, जिस पर तीन गुम्बद बने हैं. इस काल की मुगल मस्जिदें, पुण्यस्थान को तीन भागों में बांटतीं हैं; बीचों बीच मुख्य स्थान, एवं दोनो ओर छोटे स्थान. ताजमहल में हरेक पुण्यस्थान एक वृहत मेहराबी तहखाने में खुलता है. यह साथी इमारतें 1643 में पुरी हुईं. निर्माण  ताजमहल परिसीमित  आगरा नगर के दक्षिण छोर पर एक छोटे भूमि पठार पर बनाया गया था. शाहजहाँ ने इसके बदले जयपुर के महाराजा जयसिंह को आगरा शहर के मध्य एक वृहत महल दिया था.  लगभग तीन एकड़ के क्षेत्र को खोदा गया, एवं उसमें कूडा़ कर्कट भर कर उसे नदी सतह से पचास मीटर ऊँचा बनाया गया, जिससे कि सीलन आदि से बचाव हो पाए. मकबरे के क्षेत्र में, पचास कुँए खोद कर कंकड़-पत्थरों से भरकर नींव स्थान बनाया गया. फिर बांस के परंपरागत पैड़ (स्कैफ्फोल्डिंग) के बजाय, एक बहुत बडा़ ईंटों का, मकबरे समान ही ढाँचा बनाया गया. यह ढाँचा इतना बडा़ था, कि अभियाँत्रिकों के अनुमान से उसे हटाने में ही सालों लग जाते. इसका समाधान यह हुआ, कि शाहजाहाँ के आदेशानुसार स्थानीय किसानों को खुली छूट दी गई कि एक दिन में कोई भी चाहे जितनी ईंटें उठा सकता है और वह ढाँचा रात भर में ही साफ हो गया. सारी निर्माण सामग्री एवं संगमर्मर को नियत स्थान पर पहुँचाने हेतु, एक पंद्रह किलोमीटर लम्बा मिट्टी का ढाल बनाया गया बीस से तीस बैलों को खास निर्मित गाडि़यों में जोतकर शिलाखण्डों को यहाँ लाया गया था. एक विस्तृत पैड़ एवं बल्ली से बनी, चरखी चलाने की प्रणाली बनाई गई, जिससे कि खण्डों को इच्छित स्थानों पर पहुँचाया गया. नदी से पानी लाने हेतु रहट प्रणाली का प्रयोग किया गया था. उससे पानी ऊपर बने बडे़ टैंक में भरा जाता था फिर यह तीन गौण टैंकों में भरा जाता था, जहाँ से यह नलियों (पाइपों) द्वारा स्थानों पर पहुँचाया जाता था. आधारशिला एवं मकबरे को निर्मित होने में बारह साल लगे. शेष इमारतों एवं भागों को अगले दस वर्षों में पूर्ण किया गया. इनमें पहले मीनारें, फिर मस्जिद, फिर जवाब एवं अंत में मुख्य द्वार बने. क्योंकि यह समूह, कई अवस्थाओं में बना,  इसलिये इसकी निर्माण-समाप्ति तिथि में कई भिन्नताएं हैं. यह इसलिये है, क्योंकि पूर्णता के कई पृथक मत हैं. मुख्य मकबरा 1643 में पूर्ण हुआ था, किंतु शेष समूह इमारतें बनती रहीं. इसी प्रकार इसकी निर्माण कीमत में भी भिन्नताएं हैं, क्योंकि इसकी कीमत तय करने में समय के अंतराल से काफी फर्क आ गया है. फिर भी कुल मूल्य लगभग 3 अरब 20 करोड़ रुपए, उस समयानुसार आंका गया है; जो कि वर्तमान में खरबों डॉलर से भी अधिक हो सकता है, यदि वर्तमान मुद्रा में बदला जाए. ताजमहल को सम्पूर्ण भारत एवं एशिया से लाई गई सामग्री से निर्मित किया गया था. 1,000 से अधिक हाथी निर्माण के दौरान यातायात हेतु प्रयोग हुए थे. पराभासी श्वेत संगमर्मर को राजस्थान से लाया गया था, जिस पर  को पंजाब से, हरिताश्म या जेड एवं स्फटिक या क्रिस्टल को चीन से. तिब्बत से फीरोजा़, अफगानिस्तान से लैपिज़ लजू़ली, श्रीलंका से नीलम एवं अरबिया से इंद्रगोप या (कार्नेलियन) लाए गए थे. कुल मिला कर अठ्ठाइस प्रकार के बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न श्वेत संगमर्मर में जडे. गए थे. उत्तरी भारत से लगभग बीस हजा़र मज़दूरों की सेना अन्वरत कार्यरत थी. बुखारा से शिल्पकार, सीरिया एवं ईरान से सुलेखन कर्ता, दक्षिण भारत से पच्चीकारी के कारीगर, बलूचिस्तान से पत्थर तराशने एवं काटने वाले कारीगर इनमें शामिल थे. कंगूरे, बुर्जी एवं कलश आदि बनाने वाले, दूसरा जो केवल संगमर्मर पर पुष्प तराश्ता था, इत्यादि सत्ताईस कारीगरों में से कुछ थे, जिन्होंने सृजन इकाई गठित की थी. कुछ खास कारीगर, जो कि ताजमहल के निर्माण में अपना स्थान रखते हैं, वे हैं. मुख्य गुम्बद का अभिकल्पक इस्माइल (ए.का.इस्माइल खाँ) जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य का प्रमुख गोलार्ध एवं गुम्बद अभिकल्पक थे. फारस के उस्ताद ईसा एवं ईसा मुहम्मद एफेंदी (दोनों ईरान से), जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य के कोचा मिमार सिनान आगा द्वारा प्रशिक्षित किये गये थे, इनका बार बार यहाँ के मूर अभिकल्पना में उल्लेख आता है. परंतु इस दावे के पीछे बहुत कम साक्ष्य हैं. बेनारुस, फारस (ईरान) से 'पुरु' को पर्यवेक्षण वास्तुकार नियुक्त किया गया. का़जि़म खान, लाहौर का निवासी, ने ठोस सुवर्ण कलश निर्मित किया. चिरंजी लाल, दिल्ली का एक लैपिडरी, प्रधान शिलपी, एवं पच्चीकारक घोषित किया गया था. अमानत खाँ, जो कि शिराज़, ईरान से था, मुख्य सुलेखना कर्त्ता था. उसका नाम मुख्य द्वार के सुलेखन के अंत में खुदा है .मुहम्मद हनीफ, राज मिस्त्रियों का पर्यवेक्षक था,  साथ ही मीर अब्दुल करीम एवं मुकर्‍इमत खां, शिराज़, ईरान से  इनके हाथिओं में प्रतिदिन का वित्त एवं प्रबंधन था. इतिहास  ताजमहल के पूरा होने के तुरंत बाद ही, शाहजहाँ को अपने पुत्र औरंगजे़ब द्वारा अपदस्थ कर, आगरा के किले में नज़रबन्द कर दिया गया. शाहजहाँ की मृत्यु के बाद, उसे उसकी पत्नी के बराबर में दफना दिया गया था. 
 
 



वीर अब्दुल हमीद एक जाबाज़ सपूत ...

वीर अब्दुल हमीद एक जाबाज़ सपूत ...

शख्सियत.....
कम्पनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद (जुलाई १, १९३३ - सितम्बर १०, १९६५)भारतीय सेना की ४ ग्रेनेडियर में एक सिपाही थे जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सैक्टर के आसल उत्ताड़ में लड़े गए युद्ध में अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति प्राप्त की जिसके लिए उन्हें मरणोपरान्त भारत का सर्वोच्च सेना पुरस्कार परमवीर चक्र मिला. यह पुरस्कार इस युद्ध, जिसमें वे शहीद हुये, के समाप्त होने के एक सप्ताह से भी पहले १६ सितम्बर १९६५ को घोषित हुआ. मरने से पहले परमवीर अब्दुल हमीद ने मात्र अपनी "गन माउन्टेड जीप" से उस समय अजेय समझे जाने वाले पाकिस्तान के "पैटन टैंकों" को नष्ट किया था. वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गाँव में १ जुलाई १९३३ में एक साधारण दर्जी परिवार में हुआ था। उनके पिता लांस नायक उस्मान फारुखी भी ग्रेनेडियर में एक जवान थे। वे २७ दिसम्बर १९५४ को ४ ग्रेनेडियर में भर्ती हुये। और अपने सेवा काल में सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल से सम्मान प्राप्त किया था. चेतन आनन्द द्वारा निर्मित १९८८ के दूरदर्शन धारावाहिक परमवीर चक्र में हवलदार अब्दुल हमीद की भूमिका नसीरुद्दीन शाह ने निभायी. ८- सितम्बर-१९६५ की रात में, पाकिस्तान द्वारा भारत पर हमला करने पर, उस हमले का जवाव देने के लिए भारतीय सेना के जवान उनका मुकाबला करने को खड़े हो गए। वीर अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे। पाकिस्तान ने उस समय के अपराजेय माने जाने वाले "अमेरिकन पैटन टैंकों" के के साथ, "खेम करन" सेक्टर के "असल उताड़" गाँव पर हमला कर दिया. भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और नहीं बड़े हथियार लेकिन उनके पास था भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का हौसला। भारतीय सैनिक अपनी साधारण "थ्री नॉट थ्री रायफल" और एल.एम्.जी. के साथ पैटन टैंकों का सामना करने लगे। हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास "गन माउनटेड जीप" थी जो पैटन टैंकों के सामने मात्र एक खिलौने के सामान थी. वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में बैठ कर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर अंगों पर एकदम सटीक निशाना लगाकर एक -एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया। उनको ऐसा करते देख अन्य सैनकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तान फ़ौज में भगदड़ मच गई। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी "गन माउनटेड जीप" से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट किया था. देखते ही देखते भारत का "असल उताड़" गाँव "पाकिस्तानी पैटन टैंकों" की कब्रगाह बन गया। 

लेकिन भागते हुए पाकिस्तानियों का पीछा करते "वीर अब्दुल हमीद" की जीप पर एक गोला गिर जाने से वे बुरी तरह से घायल हो गए और अगले दिन ९ सितम्बर को उनका स्वर्गवास हो गया लेकिन उनके स्वर्ग सिधारने की आधिकारिक घोषणा १० सितम्बर को की गई थी. इस युद्ध में साधारण "गन माउनटेड जीप" के हाथों हुई "पैटन टैंकों" की बर्बादी को देखते हुए अमेरिका में पैटन टैंकों के डिजाइन को लेकर पुन: समीक्षा करनी पड़ी थी। लेकिन वो अमरीकी "पैटन टैंकों" के सामने केवल साधारण "गन माउनटेड जीप" जीप को ही देख कर समीक्षा कर रहे थे, उसको चलाने वाले "वीर अब्दुल हमीद" के हौसले को नहीं देख पा रहे थे. इस युद्ध में असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें पहले महावीर चक्र और फिर सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। सारा देश उनकी बहादुरी को प्रणाम करता है....
भारतीय गौरवशाली गणराज्य के रचयिता – सरदार वल्लभ भाई पटेल .

भारतीय गौरवशाली गणराज्य के रचयिता – सरदार वल्लभ भाई पटेल .

 स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष को परिणति तक पहुंचने के ऐन पहले पांच सौ से ज्यादा देसी रियासतों में बंटे भारत वर्ष को एकसूत्र में पिरोकर भारत संघ में शामिल करना एक असंभव काम था। इसके लिए रियासतों को राजी करना, फिर आजादी के साथ ही मिले विभाजन के बेहद खुरदरे जख्म पर मखमली मरहम लगाना, ये सारे काम सबल राष्ट्र की मजबूत नींव के लिए जरुरी था। इन शुरुआती दुरुह कामों को पूरा करने की पूरी जिम्मेदारी सरदार बल्लभ भाई झवेरी भाई पटेल ने अपने कंधे पर ली। उनके अथक औऱ अहिर्निश मेहनत का नतीजा है कि आज भारतीय गणतंत्र की दुनिया भर में तूती बोल रही है। यह हमारा सौभाग्य था कि सरदार बल्लभभाई पटेल को भारत का पहला उप प्रधानमंत्री बनाया गया। गृह मंत्रालय का प्रभार उनके पास रहा। फिर उन्होंने “साम, दाम, दंड, भेद” का जबरदस्त इस्तेमाल किया .
 लौहपुरुष के तौर पर बनी उनकी कूटनीति छवि  पीढियों के प्रेरक बनी रहेंगी । अपने इस महानायक की जयंती 31 अक्टूबर को राष्ट्र ने आजादी के सडसठ साल बाद 2014 में “राष्ट्रीय एकता दिवस” के तौर पर मनाने की शुरुआत की है। राष्ट्रीय एकता में एतिहासिक योगदान करने वाले नायक सरदार पटेल की नर्मदा डैम पर 182 मीटर ऊंची विशालकाय प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई है। इसके लिए देशभर से लोहे मंगवाकर एकता का अतुलनीय मिसाल पेश की गई है.बीते तीन वर्षों की तरह ही इस बार भी 31 अक्टूबर को केंद्र सरकार का “राष्ट्रीय एकता दिवस” पर महानायक सरदार बल्लभ भाई पटेल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए विशेष आयोजनों पर जोर है। ताकि भावी पीढी को राष्ट्रनायक के कृतत्व से परिचित कराया जा सके। भारत सरकार की ओर से बड़े पैमाने पर आयोजित कार्यक्रमों के जरिए स्वतंत्रता संग्राम में सरदार पटेल के अप्रतीम योगदान और आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण के उनके बेजोड़ काम को याद किया जाता है .राष्ट्रीय एकता दिवस के कार्यक्रमों की सफलता के लिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है। इसमें राष्ट्रीय एकता के मौके पर “एकता के संकल्प” को सुदृढ करने वाले कार्यक्रमों की सफलता में विशेष योगदान करने का आग्रह किया गया है। राष्ट्रीय एकता के संकल्प को सुदृढ करने वाले कार्यक्रम की एतिहासिक सफलता के लिए विभिन्न शासकीय मुख्यालयों पर अर्द्धसैनिक बलों का मार्च पास्ट, एकता दौड़, पोस्टर व क्विज प्रतियोगिताएं, सरदार पटेल के योगदान के रेखांकित करने वाली प्रदर्शनियों के आयोजन किए जा रहे है। स्कूल-कालेजों में इस अवसर पर विशेष आयोजनों को बढावा दिया जा रहा है. स्वंय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय एकता दिवस की सफलता के प्रति विशेष आग्रह है। इस बार 31 अक्टूबर को “ऱाष्ट्रीय एकता दिवस” के राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में संसद मार्ग स्थित सरदार पटेल चौक पर सरदार की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ शुरू होगी। इसके साथ ही नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में एकता के लिए यूनिटी रन को प्रधानमंत्री हरी झंडा दिखाएंगे। इसमें लगभग 15,000 छात्र, पूर्व सैनिक, प्रसिद्ध एथलीट और एनएसएस स्वयंसेवकों को भाग लेना है। इस फ्लैग-ऑफ़ में एमएसपी वी सिंधु (बैडमिंटन), एमएस मिताली राज (क्रिकेट) और सरदार सिंह (हॉकी) सहित खेलकूद के कई शीर्षस्थ खिलाडी मौजूद रहेंगे ।
इसके अलावा रेलवे, संस्कृति, पर्यटन, सूचना और प्रसारण और आवास और शहरी मामलों के मंत्रालयों समेत केंद्र सरकार के अन्य प्रतिष्ठानों को एकजुटता के संदेश को फैलाने के लिए विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही हैं। कनॉट प्लेस के केंद्रीय पार्क और चाणक्यपुरी में शांति पथ पर रोज गार्डन में सरदार पटेल क याद में प्रदर्शनी का आयोजन है। केंद्र सरकार ने ऱाष्ट्रीय एकता दिवस को एक त्योहार का रंग देने की तैयारी कर रखी है। रेडियो व दूरदर्शन पर सरदार पटेल पर आधारित कार्यक्रमों का बोलबाला रहेगा। सरदार पटेल पर छह पुस्तकों के नए संस्करण जारी किए जाएंगे और वे ई-पुस्तक के रूप में उपलब्ध होंगे . महानायक सरदार पटेल के योगदान के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि वह आजादी का संक्रमण काल में ही राष्ट्र निर्माण के प्रति सक्रिय हो गए थे। रियासतों में बिखरे पडे राष्ट्र को समेटने के लिए सरदार पटेल ने अथक काम किया। उन्होंने भारत के तत्कालीन गृह मंत्री के तौर पर उन स्वंय संप्रभुता वाले रियासतों का भारतीय संघ में विलय आरंभ कर दिया जो अलग पहचान रखती थीं। उनका अलग झंडा और  शासक था। देसी रियासतों को एक करने का असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को उन्होंने विस्मित करने के अंदाज में पूरा किया। इससे दुनिया ने भारत की कूटनीति का लोहा मान लिया। बल्लभ भाई पटेल ने 1928 में बारडोली में अंग्रेजों के खिलाफ सफल किसान आंदोलन किया था। तब वहां की महिलाओं ने उनको सरदार की उपाधि दी थी। बाद में अपनी शासकीय क्षमता और अतुल्य कूटनीतिक क्षमता की वजह से सरदार पटेल को “लौहपुरुष” कहा जाने लगा। लौहपुरुष पटेल ने राष्ट्र निर्माण के लिए चाणक्य सा कौशल और अप्रतीम बुद्धिमत्ता का प्रयोग किया।
उन्होने भावी भारत के लिए 5 जुलाई 1947 को रियासतों के प्रति रीति नीति को स्पष्ट करते हुए कहा, “रियासतों को तीन विषयों- सुरक्षा, विदेश तथा संचार व्यवस्था के आधार पर भारतीय संघ में शामिल किया जाएगा।“ यह एलान काम कर गया। इसके साथ ही देसी रियासतों के संघ में बिखराव की प्रक्रिया शुरु हो गई। धीरे धीरे बहुत सी देसी रियासतों के शासक भोपाल के नवाब से अलग हो गए। इससे नवस्थापित रियासती विभाग की योजना को सफलता का आधार मिला। यह इतिहास में भारतीय कूटनीति के लिए गर्व का हिस्सा है कि अहिर्निश मेहनत करते सरदार पटेल ज्यादातर देसी राजाओं को समझाने में सफल रहे कि उन्हें स्वायत्तता देना संभव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरुप तीन को छोड़कर सभी राजवाड़ों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष रियासतें भारत संघ में शामिल हो गईं। जूनागढ़ के नवाब के खिलाफ जबरदस्त विरोध हुआ, तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया। सरदार पटेल की सदारत में जूनागढ़ का भारत में विलय हो गया। कूटनीति की असली परीक्षा हैदराबाद के निजाम ने ली। जब उसने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करवा लिया। 31 अक्टूबर 1875 को नडियाद, गुजरात के एक लेवा कृषक परिवार में हुआ था। छोटे से गांव में पैदा हुए सरदार बल्लभ भाई पटेल ने क़डी करके मेहनत से इतना पैसा बचाया कि वह उच्च कानूनी शिक्षा के लिए इंग्लैंड जा पाएं। पढाई पूरी कर वापस अहमदाबाद आ गए और अपनी कानूनी क्षमता से आम लोगों को न्याय दिलाने के लिए सक्रिय हो गए। फिर महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए महात्मा गांधी ने अपने सफल सिपाही सरदार पटेल को लिखा, “रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।“ निस्संदेह एक रक्तहीन क्रांति से 562 रियासतों का एकीकरण दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है। आजादी के बाद बनी सरकार में विदेश विभाग प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के पास था। उप प्रधानमंत्री के नाते सरदार पटेल कैबिनेट की विदेश विभाग की समिति में जाते थे। उन बैठकों में पंडित नेहरु से उनका खटपट होना बताता है कि उनकी दूरदर्शिता का लाभ लिया गया होता तो वतर्मान में मौजूद अनेक समस्याओं का जन्म नहीं होता। मसलन 1950 में पटेल ने पंडित नेहरु को खत लिखकर चीन तथा उसकी तिब्बत नीति के प्रति आगाह किया था। चीन के कपटपूर्ण और विश्वासघाती रवैए का जिक्र किया था। तिब्बत पर चीन के कब्जे को लेकर कहा था कि इससे नई समस्याएं जन्म लेंगी। 1950 में नेपाल के संदर्भ में सरदार पटेल के लिखे पत्र से भी पंडित नेहरु सहमत नहीं थे। इसी तरह गोवा को आजादी दिलाने में 1950 में ही योगदान के प्रति पटेल ने उत्सुकता दिखाई थी। गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में दो घंटे तक चली कैबिनेट बैठक में सरदार पटेल ने कहा, “क्या हम गोवा जाएंगे? दो घंटे की बात है।“ उससे नेहरु बड़े नाराज हुए थे प्रशासनिक कौशल का परिचय देते हुए सरदार पटेल ने नौकरशाही के सुधार पर काम किया। अंग्रेजों को सेवा देने की वजह से राजभक्ति के लिए बनी भारतीय नागरिक सेवा (आईसीएस) का भारतीयकरण किया। राजभक्ति की जगह देशभक्ति को तव्वजो देते हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) बनाया। राष्ट्र निर्माण के वक्त वह पाकिस्तान क छद्म व चालाक चालों के प्रति सतर्क रहे। सरदार पटेल उन हस्तियों में से हैं जिन्होंने भारतीय गणराज्य को एक शानदार इतिहास दिया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि “राष्ट्रीय एकता दिवस” जैसे के सफल आयोजनों के जरिए लोग प्रेरित होंगे। भावी पीढ़ियां भारत को फिर से ज्ञान, कौशल व प्रतिभा से विश्व विजयी बनाने में लगी रहेंगी.
पर्यटन पर्व: भारत की विविधता के अन्वेषण का एक विशेष अवसर

पर्यटन पर्व: भारत की विविधता के अन्वेषण का एक विशेष अवसर


.समय आ गया है कि आम पर्यटन स्थलों पर जाने के बजाय भारतीय देश के खूबसूरत नुक्कड़ों, कोनों को खोजें। होटलों में ठहरने के बजाय पारंप.....

  प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही के संवाद ‘मन की बात’ में लोगों से अपील की कि वे अद्भुत भारत के विभिन्न अद्भुत स्थलों को खोजें। इसी से प्रेरित पर्यटन मंत्रालय ने पर्यटन पर्व का आयोजन किया है जिसे ‘भारतीय समृद्ध पर्यटन धरोहर के उत्सव’ के रूप में माना जा रहा है. केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय अन्य केंद्रीय मंत्रालयों, विभिन्न राज्य सरकारों और निवेशकों के साथ मिलकर पर्यटन पर्व का आयोजन समस्त भारत में 5-25 अक्टूबर, 2017 हो रहा है। इसका उद्देश्य पर्यटन के लाभों पर ध्यान आकर्षित करना, हमारी सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन करना एवं ‘सबके लिए पर्यटन’ के सिद्धांत को सुदृढ़ करना है. यह एक अद्भुत संयोग है कि पर्व-प्रेमी भारत देश में इस पर्यटन पर्व का आयोजन उस समय किया जा रहा है जब देश में त्योहारों कि धूम एवं उत्साह का माहौल है। साथ ही यह समय ऐसा है जब लोग घर व शहर से बाहर निकलकर किसी स्थान पर घूमने का समय निकालते हैं परन्तु आमतौर पर लोग नए, शांत और थोड़े अनजान स्थान खोजने के बजाय उन्हीं पुरानी और भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाते हैं। समय आ गया है कि आम पर्यटन स्थलों पर जाने के बजाय भारतीय देश के खूबसूरत नुक्कड़ों, कोनों को खोजें, होटलों में ठहरने के बजाय पारंपरिक एवं सांस्कृतिक लोगों के साथ रहें.पर्यटन पर्व यही अवसर देता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत सरकार की इस योजना से दो अति महत्त्वपूर्ण बातें मेरी समझ में आई हैं - ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ योजना के अंतर्गत अन्तर्राज्यीय संबध तथा सी.बी.एस.ई. मान्यता प्राप्त विद्यालयों को अन्य गतिविधियों के साथ विरासत रूप स्मारकों की यात्रा हेतु दिशा-निर्देश देना.देखा जाए तो स्कूली बच्चों के लिए स्मारकों के दर्शन का विचार नया नहीं है लेकिन ‘पर्यटन एवं अध्ययन’ से इसे जोड़ना इसे नया बनाता है। 

कल्पना करें कि एक कक्षा महाराष्ट्र के एक किले में बैठकर छत्रपति शिवाजी की विजय के बारे में पढ़ रही हो या अकबर ने क्या किया यह आगरा के किसी किले में बैठकर सीखा जा रहा हो। ये स्मारक ज्ञान एवं जानकारी का खजाना हैं। वे केवल इतिहास के पाठ ही उपलब्ध नहीं कराते बल्कि उस युग के शिल्पकला और परंपरागत प्रथाओं से भी अवगत कराते हैं। वास्तविक दर्शन से बेहतर सीखने का कोई और तरीका नहीं हो सकता.भारत का सौभाग्य है कि यह 3500 से अधिक स्मारकों से संपन्न है और 10,000 अन्य स्मारकों की देख-रेख राज्य सरकारें करती हैं.इसी प्रकार कल्पना करें कि केरल हिमाचल प्रदेश के साथ इस प्रकार का आगमन-निगमन करे या मध्य प्रदेश नागालैंड और मणिपुर के बारे में अधिक जानकारी की खोजबीन करे। कितनी सुन्दर संकल्पना होगी यदि अच्छी तरह स्थापित हो। आदि शंकराचार्य ने चार धामों की स्थापना देश के चार कोनों में और बारह ज्योतिर्लिंगों की स्थापना देश के विभिन्न स्थलों पर इसी संकल्पना सिद्धि के लिए की थी.न केवल तीर्थ स्थलों के लिए परन्तु विस्तृत धरती की समृद्ध परम्पराओं और संस्कृति को जानने के लिए लोगों को अन्य राज्यों, शहरों से भी जुड़ना चाहिए। इसी सोच और ध्येय को धारण कर पर्यटन मंत्रालय ने ‘पर्यटन पर्व’ की संकल्पना की जिससे एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति, परंपरा एवं प्रथाओं का ज्ञान प्राप्त कर बेहतर संबंध बने। यह भारतीय एकता एवं अखंडता का सशक्तिकरण होगा...